गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

भुमिका

 🙏 🌺भूमिका🌺


अनादि काल से ही मानव परम शांति, सुख व अमृत्व की खोज में लगा हुआ है। वह अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रयत्न करता आ रहा है लेकिन उसकी यह चाहत कभी पूर्ण नहीं हो पा रही है एसा इसलिए है कि उसे इस चाहत को प्राप्त करने के मार्ग का पूर्ण ज्ञान नहीं हैं/ सभी प्राणी चाहते हैं कि कोई कार्य न करना पड़े, खाने को स्वादिष्ट भोजन मिले, पहनने को सुन्दर वस्त्र मिलें, रहने को आलीशान भवन हो, धूमने के लिए सुन्दर पार्क हो, मनोरंजन करने के लिए मधुर-२ संगीत हो, नाचै-गाए, खैले-कूदें, मौजमस्ती मनाए और कभी बीमार न हो, कभी बूढ़े न हो और कभी मृत्यु न होवे आदि २, परनु जिस संसार में हम रह रहे हैं यहां न तो एसा कहीं पर नजर आता है और न ही एला संभव है। क्योंकि यह लोक नाशवान है, इस लोक की हर वस्तु भी नाशवान है और इस लोक का राजा ब्रह्म काल है जो एक लाख मानव सूक्ष्म शरीर खाता है। उसने सब प्राणियों को कर्म-भर्म व पाप पुण्य रूपी जाल में उलझा कर तीन लोक के पिंजरे मैं कैद किए हुए है । कबीर साहब कहते हैं कि -कबीर, तीन लोक पिंजरा भया, पाप पुण्य दो जाल । सभी जीव भोजन भये. एक खाने वाला काल । । 


गरीब, एक पापी एक पुनि आया, एक है सूम दलेल रे । बिना भजन कोई काम नहीं आवै, सब है जम की जेल रे । । 


वह नहीं चाहता कि कोई प्राणी इस पिंजरे रूपी कैद से बाहर निकल जाए। वह यह भी नहीं चाहता कि जीव आत्मा को अपने नीज घर सतलोक का पता चलै । इसलिए वह अपनी त्रीगुणी माया से हर जीव को भ्रमित किए हुए है। फिर मानव को ये उपरोक्त चाहत कहां से उत्पन्न हुई हैं ? यहां एसा कुछ भी नहीं है। यहां हम सबने मरना हैं, सब दुखी व असान्त हैं/ जिस स्थिति को हम यहां प्राप्त करना चाहते हैं एसी स्थिति में हम अपने निज घर सतलोक में रहते थे/ काल ब्रह्म के लोक में स्वइच्छा से आकर फंस गए और अपन नीज घर का रास्ता भूल गए / कबीर साहब कहते हैं कि -


इच्छा रूपी खेलन आया, ताते सुख सागर नहीं पाया । 


इस काल ब्रह्म के लोक में शांति व सुख का नामोनिशान भी नहीं है। त्रिगुणी माया से उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, लाभ हानि, मानबड़ाई रूपी अवगुण हर जीव को परेशान किए हुए हैं/ यहा" एक जीव दूसर जीव को मार कर खा जाता है, शोषण करता है, ईज्जत लूट लेता है, धन लूट लेता हैं, शांति छीन लेता है/ यहा' पर चारों तरफ आग लगी है/ यदि आप शांति से रहना चाहोगे तो दूसरे आपको नहीं रहने देंगे/ आपके न चाहते हुए भी चोर चोरी कर ले जाता है, डाकू डाका डाल ले जाता हैं, दुर्घटना घट जाती है, किसान की फसल खराब हो जाती है, व्यापारी का व्यापार ठप्प हो जाता है, राजा का राज छीन लिया जाता है, स्वस्थ शरीर में बीमारी लग जाती है अर्थात् यहा' पर कोई भी वस्तु सुरक्षित नहीं है / राजाओं के राज, इज्जतदार की इज्जत, धनवान का धन, ताकतवर की ताकत और यहां तक की हम सभी के शरीर भी अचानक छीन लिए जाते हैं/ मातापिता के सामने जवान बेटा-बेटी मर जाते हैं, दूध पीते बच्चों को रोते बिलखते छोड़ कर माता पिता मर जाते हैं, जवान बहनें विधवा हो जाती हैं और पहाड़ से दुखों को भोगने को मजबूर होते हैं/ विचार करें कि क्या यह स्थान रहने के लायक है ? लेकिन हम मजबूरी वश यहां रह रहे हैं क्योंकि इस काल के पिंजरे से बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता और हमें दूसरों को दुःखी करने की व दुख सहने की आदत सी बन गई/ यदि आप जी को इस लोक में होने वाले दुखों से बचाव करना है तो यहां के प्रभु काल से परम शक्ति युक्त परमेश्वर (परम अक्षर ब्रह्म) की शरण लेनी पड़ेगी। जिस परमेश्वर का खौंफ काल प्रभु को भी है/ जिस के डर से यह उपरोक्त कष्ट उस जीव को नहीं दे सकता जो पूर्ण परमात्मा अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म (सत्य पुरूष) की शरण पुर्ण संत के बताए मार्ग को ग्रहण करता है। वह जब तक संसार में भक्ति करता रहेगा, उसको उपरोक्त कष्ट आजीवन नहीं होते । जो व्यक्ति इस पुस्तक "ज्ञान गंगा" को पढ़ेगा उसको ज्ञान हो जाएगा कि हम अपने नीज घर को भूल गए हैं। वह परम शांति व सुख यहा' न होकर निज घर सतलोक में है जहां पर न जन्म है, न मृत्यु है, न बुढ़ापा, न दुख, न कोई लड़ाई-झगड़ा हैं, न कोई बिमारी हैं, न पैसे का कोई लेन-देन है, न मनोरंजन के साधन खरीदना है/ वहा पर सब परमात्मा द्वारा निःशुल्क व अखण्ड है/ बन्दी छोड़ गरीबदास जी महाराज की वाणी यें प्रमाण है कि :बीन ही मुख सारंग राग सुन. बीन ही तंती तार । बिना सुर अलगोजे बाजै, नगर नाच घुमार । । घंटा बाजै ताल नग, मंजीरे डफ झांझ । मुरली मधुर सुहावनी. निसवार और सांझ । । बीन विहंगम बाजहिं, तरक तम्यूरे तीर । राग खण्ड नहीं होते है, बंध्या रहत समीर । । तरक नहीं तोरा नही. नाही कशीस कबाब । अमृत प्याले मध पीवै. ज्यो भाटी चबै शराबा । मतवाले मस्तानपुर, गली…२ गुलजार । संख शराबी फिरत है, चली तास बजार । । संख-संख पत्नी नाचै, गावै शब्द सुभान । चद्र बदन सूरजमुखी, नाही मान गुमान । । संख हिंडोले नूर नग, झूले सत हजूर । तख्त धनी के पास कर, ऐसा मुलक जहूर । । नदी नाव नाले बगै, छुटै फुहारे सुन्न । भरे हौद सरवर सदा, नहीं पाप नहीं पुण्य । । ना कोई भिक्षुक दान दे, ना कोई हार व्यवहार । ना कोई जन्मे मरे. ऐसा देश हमार । । जहा संखो। लहर मेहर की उपजै, कहर जहा नहीं कोई । दासगरीब अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई । । 


सतलोक में केवल एक रस परम शांति व सुख है/ जब तक हम सतलोक में नहीं जायेंगे तब तक हम परमशांति, सुख व अमृत्व को प्राप्त नहीं कर सकते/ सतलोक में जाना तभी संभव है जब हम पुर्ण संत से उपदेश लेकर पूर्ण परमात्मा की आजीवन भक्ति करते रहें। इस पुस्तक "ज्ञान गंगा" के माध्यम से जो हम संदेश देना चाहते हैं उसमें किसी देवी देवता व धर्म की बुराई न करके सर्व पवित्र धर्म ग्रंथों में छुपे गुढ रहस्य को उजागर करके यथार्थ भक्ति मार्ग बताना चाहा है जो कि वर्तमान के सर्व संत, महंत व आचार्य गुरु साहेबान शास्त्रों में छिपे गूढ रहस्य को समझ नहीं पाए/ परम पूज्य कबीर साहेब अपनी बाणी में कहते हैं की 'वेद कतेब झूठे ना भाई, झूठे हैं सो समझे नाही । 


जिस कारण भक्त समाज को अपार हानि हो रही है/ सब अपने अनुमान से व झुठे गुरुओं द्वारा बताई गई शास्त्र विरुद्ध साधना करते हैं। जिससे न मानसिक शांति मिलती है और न ही शारीरिक सुख, न ही घर व काररेबार में लाभ होता है और न ही परमेश्वर का साक्षात्कार होता है और न ही मोक्ष प्राप्ति होती है/ यह सब कुछ कैसे मिले तथा यह जानने के लिए कि मैं कौन हूँ, कहां से आया हूँ, क्यों जन्म लेता हूँ, क्यों मरता हूँ और क्यों दुख भोगता हूँ ? आखिर यह सब कौन करवा रहा हैं और परमेश्वर कौन है, कैसा है, कहां है तथा कैसे मिलेगा और ब्रह्मा, विष्णु और शिव के माता पिता कौन हैं और किस प्रकार से काल ब्रह्म की जेल से छुटकारा पाकर अपने नीज घर सतलोक में वापिस जा सकते हैं यह सब इस पुस्तक के माध्यम से दर्शाया गया है ताकि इसे पढ़कर आम भक्त आत्मा का कल्याण संभव हो सके यह पुस्तक सतगुरु रामपाल जी महाराज के प्रवचनों का संग्रह है। जोकि सदग्रंथों में लिखे तथ्यों पर आधारित है हमें पूर्ण विश्वास है कि जो पाठक जन रुचि हुआ निष्पक्ष भाव से पढ़कर अनुसरण करेगा उसका कल्याण संभव है।

:- आतम प्राण उद्धार ही ऐसा धर्म नहीं और कोटी अश्वमेघ यज्ञ सकल समाना भौर जीव उद्धार परम पुण्य ऐसा कर्म नहीं और मरुस्थल के मृग ज्यों, सब मर गए दौड़ दौड़ ।।

भावार्थ‍‌‌‍‍ _ यदि एक आत्मा को सत भक्ति मार्ग पर लगाकर उसका आत्म कल्याण करवा दिया जाए तो करोड़ अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है और उसके बराबर कोई भी धर्म नहीं है जीवात्मा के उद्धार के लिए किए गए कार्य अर्थात सेवा से श्रेष्ठ कोई भी कार्य नहीं है अपने पेट भरने के लिए तो पशु-पक्षी भी सारा दिन भ्रमते हैं उसी तरह वह व्यक्ति है जो परमार्थी कार्य नहीं करता परमार्थी कर्म सर्वश्रेष्ठ सेवा जीव कल्याण के लिए किया कर्म है जीव कल्याण का कार्य ना करके सर्व मानव मरुस्थल के हिरण की तरह दौड़ दौड़ कर मर जाते हैं जिसे कुछ दूरी पर जल ही जल दिखाई देता है और वह दौड़ कर जाने पर थल ही प्राप्त होता है फिर कुछ दूरी पर थल का जल दिखाई देता है अंत में उस हिरण की प्यास से ही मृत्यु हो जाती है ठीक इसी प्रकार जो प्राणी इस लोक में जहां हम रह रहे हैं वे उस हिरण के समान सुख की आशा करते हैं जैसे निसंतान सोचता है संतान होने पर सुखी हो जाऊंगा संतान वालों से पूछे तो उनकी अनेकों समस्याएं सुनने को मिलेगी निर्धन व्यक्ति सोचता है कि धन हो जाए तो मैं सुखी हो जाऊं जब धनवानो की कुशल जानने के लिए प्रश्न करोगे तो ढेर सारी परेशानियां सुनने को मिलेगी कोई राज्य प्राप्ति से सुख मानता है यह उसकी महा भूल है राजा मंत्री मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को स्वप्न में भी सुख नहीं होता जैसे चार पांच सदस्यों के परिवार का मुखिया अपने परिवार के प्रबंधन में कितना परेशान रहता है राजा तो एक क्षेत्र का मुखिया होता है उसके प्रबंधन में सुख स्वप्न में भी नहीं होता राजा लोग शराब पीकर कुछ गम भुलाते हैं माया इकट्ठे करने के लिए जनता से कर लेते हैं फिर अगले जन्मों में जो राजा सत भक्ति नहीं करते पशु योनियों को प्राप्त होकर प्रत्येक व्यक्ति से वसूले करके उनके पशु बनकर लौटाते हैं जो व्यक्ति मन मुखी होकर तथा झूठे गुरुओं से दीक्षित होकर भक्ति तथा धर्म करते हैं वह सोचते हैं कि भक्ति में सुख होगा लेकिन इसके विपरीत दुख ही प्राप्त होता है  कबीर साहेब  कहते हैं कि मेरा यह ज्ञान ऐसा है कि यदि ज्ञानी पुरुष होगा तो इसे सुनकर ह्रदय में बसा लेगा और यदि मूर्ख होगा तो उसकी समाज से बाहर है 

कबीर ज्ञानी सुने तो हृदय लगाई मूर्ख सुने तो गम ना पाए

नियम

 🙏🔥गुरु दीक्षा लेने से पहले आवश्यक नियम जिनका आपने अतिम स्वास तक पालन करना हैं🙏

 1.  हुक्का शराब , मांस , तम्बाकू , बीयर, सिगरेट, हुलांस सुंघना , अण्डा , सुल्फा , अफीम, गांजा और अन्य नशीली वस्तुओं का सेवन तो दूर रहा किसी को नशीली वस्तु ला कर भी नहीं देनी हैं । क्योंकि बुराई करना व उसमें सहयोग देना दोनो ही महापाप हैं और भक्ति मार्ग भे विष के समान है।

2.  किसी प्रकार का कोई व्रत , तीर्थ , गंगा स्नान आदि नहीं करना तथा किसी अन्य धार्मिक स्थल पर स्नानार्थ , या दर्शनार्थ नहीं जाना है। किसी मन्दिर में पूजा व भक्ति के भाव से नहीं जाना कि इस मन्दिर में भगवान है । भगवान कोई पशु तो नहीं की उसको पुजारी जी ने मन्दिर में बांध रखा हैं। भगवान तो कण-कण में व्यापक है। उसके गुणों का लाभ लेने के लिए प्रथम गुरू बनाइए । नाम लेकर सुमिरण करो । तब आपको ईश्वरीय लाभ प्राप्त होगा । कबीर साहेब कहते हैं :कबीर पर्वत-पर्वत मैं फिरा , कारण अपने राम । राम सरीखे जन मिले , जिन सारे सब काम ।। 


3.  यदि किसी की मौत हो जाती हैं तो उसके फूल आदि कुछ नहीं उठाने हैं, ना पिण्ड भरवाने हैं, ना तेराहमी , छ:माही , बरसोदी, पित्र-पुजा , कोई भी समाधि पूजना , श्राद्ध निकालना आदि कुछ नहीं करना हैं । यह पांच तत्व से बना शरीर तो एक वस्त्र की तरह हैं । मूल वस्तु जीवात्मा है। वह कर्म आधार पर नए शरीर में जा चुकी होती हैं । हम अज्ञानियों द्वारा भ्रमित होकर पीछे क्रियाएँ कारते रहते हैं,जो व्यर्थ है । गरीबदास जी महाराज कहते हैैं,

 देह पड़ी तो क्या हुआ, झूठी सभी पटीटा।पक्षी उड़ा आकाश कूं, चलता कर गया बीट।


4. अन्य किसी देवी-देवता की पुजा नहीं करनी हैं कबीर साहेब कहते हैं … माई मसानी सेढ़ शीतला भैरव भूत हनुमत । पत्मात्मा उनसे दूर है, जो इनको पुजंत ।। 


।। कबीर, देवी-'देव ठाढे़ भये , हमको ठौर बताओ । जो मुझ (कबीर) को पुजें नहीं , उनको लूटो खाओ । 


कबीर , सौ वर्ष सतगुरू पूजा , एक दिन आन उपासी। वो अपराधी आत्मा पड़े काल की फांसी । 


5. ऐसे व्यक्ति का झूठा नहीं खाना , जो नशीले पदार्थों का सेवन करता हो।

6. जुआ,ताश कभी नहीं खेलना हैं।

7. किसी प्रकार के खुशी के अवसर पर नाचना व अश्लील गाने गाना सख्त मना हैं।

8. अपने गुरू देव जी की आज्ञा के बिना घर में किसी प्रकार का यज्ञ हवन, धार्मिक अनुष्ठान नहीं करवाना है बन्दीछोड़ अपनी वाणी मे कहते हैं 

: - गुरू बिन यज्ञ हवन जो करही मिथ्या जाय कबहु नहीं फलहीं। गुरू बीन होम यज्ञ जो साधै, ओरो दस मन पातक लागे।।

9. छुआछात नहीं करना हैं। हम सब एक मालिक के बन्दे हैं। भगवान ने किसी भी जाति या मजहब (धर्म) के स्त्री पुरूषों में कोई अन्तर नहीं किया तो हम क्यों करें ? 

10 . दहेज लेना व देना कुरीति हैं तथा मानव मात्र की अशांति का कारण है। उपदेशी के लिए मना है। जिसने अपने कलेजे की कौर पुत्री को दे दिया फिर बाकीं क्या रहा ? "आपसे आवै रत्न बराबर,  मांगा आवै लोहा "


11. वास्तुकला या ज्योतिष आदि के चक्र में नहीं पड़ना है प्रभु पर विश्वास रखें । 

👉उपरोक्त नियमों में से किसी भी नियम का उल्लंघन कर दिया तो आप नाम रहित हो जाओगे । 🙏🙏

मर्यादा

 🙏उपदेश प्राप्त पुश्यात्माएँ परमात्मा कें मार्ग पा चलतीं हैं । वह परमात्मा प्राप्ति के लिए यात्रा प्रारंभ करती है । यात्री बहुत ही कम सामान लेकर यात्रा करता है । अधिक भार उठा कर यात्रा करना संभव नहीं होता । जो सांसारिक परम्पराऐ हैं, वे व्यर्थ का भार है जो भक्तिमार्ग में यात्रा करने में बाधक हैं ! इसलिए इस भार से मुक्त होने के लिए निम्न नियमों का पालन करना अनिवार्य है . 


१. किसी के पैर नहीं छूने हैं और ना ही दूसरे को छूने देना है यदि अचानक या मना करने पर भी पैर छू लेता है तो उस स्थिति में नाम खण्ड नहीं होता । आप ने किसी को बद्दुआ या आशीर्वाद नहीं देना है, न ही इच्छा करक किसी से आशीर्वाद लेना है कोई आप के सिर पर आशीर्वाद के लिए हाथ रखे तो आपने मना करना है, फिर भी कोई हाथ रख देता है तो आप का उपदेश सुरक्षित है परन्तु आप ने आशीर्वाद व बदृदुआ बिल्कुल नहीं देनी है । क्योंकि आशीर्वाद देने से आप की भक्ति कमाई जाती है । जैसे एक पहिए की ट्रयूब से दूसरे पहिए की ट्यूब में हवा डालने से आप की गाडी खडी हो जाएगी । आप को हानि हो जाएगी । एक उपदेशी बहन ने अपने अनुपदेशी भाई को स्वस्थ होने का आशीर्वाद दे दिया भाई तो स्वस्थ हो गया परन्तु बहन इतनी ,अस्वस्थ हुई की एक "महिना अस्पताल में रही । पुन: उपदेश लिया अपनी गलती की क्षमा याचना करने पर वह स्वस्थ हो पाई । इसलिए सर्व से प्रार्थना है कि यह गलति न करें। इसी प्रकार अन्य नियमों के खण्ड करने से ' आपकी राम नाम की गाडी में पंचर हो जाएगा वह भी रूक "जाएगी अर्थात् आप जी को हानि होगी । पूर्व समय में सतिप्रथा (परम्परा) थी । जिस किसी का पति मर'जाता था तो उसकी स्त्री को भी मृत पति के साथ जिंदा जलाया जाता था जो एक महा जालिम कर्म था उस समय के मानव समाज ने उस कुरीती को मजबूरन मानना पडता था । किसी महापुरूष ने संघर्ष करके उस सतिप्रथा को बन्द कराया । समाज के रूढीवादी व्यक्तियों ने बहुत विरोध भी किया, परन्तु प्रयत्न सफल हुआ तो आज सर्व बहनें सुखी हैं । इसी प्रकार ये सर्व परम्पराएँ जानों जो मानव समाज पर भार हैं । इनको समाप्त करने से ही भार मुक्त हो सकेंगे तथा भक्ति मार्ग पर आसानी से चल सकेंगे ।


2. टी. वी., कम्यूटर तथा मोबाइल में फिल्म, सीरियल, मैच, कार्टून देखना तथा मोबाइल में विडियो गेम आदि नहीं खेलना है । 


3. किसी को दान (बीना सिला कपड़ा, सीधा आदि) नहीं देना हैं, न ही किसी धार्मिक स्थल (मन्दिर, मैण्डी) के लिए पैसे देने हैं और न ही उनक किसी भंडारे में जाना है। जैसेधर्मशाला, गली पवकी करने, कुआं तथा तालाब (जोहड़) की खुदाई, खेतों के साझले नाले की खुदाई तथा अन्य इसी प्रकार के सामूहिक सामाजिक कार्यो के लिए पैसे दे सकते हैं ।


4. माथे पर तिलक न लगाना है और न ही लगवाना है, भात में पटड़े पर नहीं चढ़ना है, गले में माला नहीं डलवानी है और न ही डालनी है और नही किसी की झोली में पैसे डालने या लेने हैं । यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो  विवाह केवल असुर निकन्दन रमैणी करके साधारण विधि से करना है तथा भात परम्परा को समाप्त करना है 


5. कोई त्यौहार, जागरण, मुण्डन, धार्मिक अनुष्ठान जन्मदिन, छटी आदि नही मनाना है, न ही उसमें जाना व सहयोग करना है । , 


6. किसी को दुआ या बदृदुआ नहीं देनी है ।


7. किसी को Good morning, Good afternoon, Good evening, Good night,  आदि शब्द नहीं बोलने हैं यदि कोई बोलता है तो उसे समय अनुसार केवल Morning Morning Evening  Evening Afternoon व Night  Night दो-दो बार बोल दें


8. Happy Birthday, Happy New year, तथा Good bye, आदि शब्द नहीं बोलने हैं यदि कोई आपसे बोलता है तो उसे धन्यवाद या Thank you बोल दे


9. सिक्खों को छोड़कर संत-बाबा रूप में दाढी न हो।


10. बहनों ने नेल पालिस ओर लिपिस्टिक नही लगानी हैं ।


11. परफ्यूम तथा सेंट आदि नहीं लगाना है ।


12. विवाहित बहनें केवल सिन्दूर या बिन्दी में से एक चीज लगा सकती हैं ।


13. किसी अनउपदेशी का झूठा नहीं खाना है यदि अनजान में खाया है तो क्षमा होता हैं । भविष्य में ध्यान रखें ।


14. हाथों पर मेंहदी नहीं लगानी है । किसी बिमारी के कारण लगा सकते है, सिर में लगा सकते हैं । हाथों में मेहंदी लगाने से नाम खण्ड होता है ।


15. शादी में जाते है तो पैसे (शगुन' वारफेरी, मुंह दिखाई पर पैसे) नहीं देने है । विदाई के समय घर में नारियल नहीं फोड़ना है, कन्याविदाई के समय गाडी पर पानी डालना या धवका लगाना आदि सगुन करना मना है ।


16. किसी को किसी भी अवसर पर Gift देना मना है 1 अगर कोई 6111दे तो कोशिश करनी है ना लो 1 अगर कोई पीछे से रख जाऐ या डाक या कोरियर द्वारा भेजे तो उसको रख लें उनके उपलक्ष में कुछ रूपये दान आश्रम में कर दें ।


17. परिवार में किसी की भी शादी हो तो परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कपड़े आदि नहीं देने व नहीं लेने हैं । 


18. कन्या दान रूप में कपड़े, गहने आदि नहीं देने हैं। रूपये भी इस उपलक्ष में देने हैं कि आप ने वहां खाना खाया है । और बहन के घर जाते है तो इसी उद्देश्य से पैसे दे सकते हैं कि आपने वहां खाना खाया है या चाय आदि पी है यदि अधिक धन दे दिया तो आप की बहन पर आप का ऋण न हो जाए तथा संस्कार न जुड जाऐं । क्योंकि हम संस्कार वश ही यहां काल जाल में रह जाते हैं । यदि आप पैसा देना चाहें और बहन न लेवे तो दोनों ही भार मुक्त हो जाते हैं । यदि बहन-बुआ जी आदि उपदेशी हैं तो उन को चाहिए कि वह पैसा रूपया-कपड़ा आभूषण कदापि न लें । प्यार से कहें कि आपने कह दिया, हमने मान लिया, ऐसे शिष्टाचार से मना कर दें । 


19. स्कूल में गायत्री मन्त्र बोलते समय ओं३म् शब्द नहीं बोलना है । क्योंकि जिसे गायत्री मंत्र कहते है यह यजुर्वेद कं अध्याय 36 का मंत्र 3 है । मूल पाठ में ओ३म् मन्त्र नहीं है । वेद परमात्मा की अनूठी देन है इसमें वृद्धि या कटौती करना, परमात्मा का अपमान है, लाभ के स्थान पर हानि ही होती है, इस लिए इस मन्त्र के साथ ओउम् नहीं बोलना है । यजुर्वेद के अ. 36 मंत्र 3 अर्थात् कथित "गायत्री मंत्र” मात्र परमात्मा की महिमा का एक मंत्र है । इसे पढने से परमात्मा के गुणों का ज्ञान होता है । जैसे बिजली की महिमा कहीं लिखी हो उसको कविता बनाकर गाते रहने से बिजली के गुणों का ज्ञान है परन्तु बिजली का लाभ नहीं मिल सकता  लाभ तो बिजली का कनेक्शन लेने से ही मिलेगा  इसी प्रकार यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 जिसको गायत्री मंत्र बताकर जाप करने को कहते हैं  वह व्यर्थ है । क्योंकि यह मंत्र तो परमात्मा की महिमा का ज्ञान कराता है । परमेश्वर के गुणों अर्थात् लाभ को बताता है । वह लाभ अधिकारी संत से सत्यनाम व सारनाम की दीक्षा प्राप्त करके अर्थात् कनेक्शन लेकर ही प्राप्त हो सकते हैैं यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 अर्थात् गायत्री मंत्र की आवृर्ति करने से नहीं  फिर भी कोई अज्ञानी व्यक्ति विद्यार्थियों को विवश ' करे तो 🕉️ शब्द का उच्चारण न करें केवल गायत्री मंत्र का भुर्भव: स्व: से ही उच्चारण प्रारम्भ करें । "ओ३म" एक  अक्षर को न लगाएँ अध्यापकों को चाहिए कि यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 की अपेक्षा सन्त गरीबदास जी महाराज की वाणी से मंगलाचरण विद्यार्थीयों से बुलाए' । गायत्री मंत्र से कई गुणा लाभ होता है परन्तु सत्यनाम बिना सब व्यर्थ है ।

 20. किसी मुर्दे के अंतिम संस्कार में लकड़ी डाल सकते हैं ! कंधे पर या'अन्य साधन द्वारा शव को ले जा सकते हैं !

 21. मुर्दे पर एक से अधिक कफन नहीं डालना है यदि आप से पहले किसी ने कफन डाल रखा हैं तो आप ने कफन नहीं डालना हैं क्योंकि कफन केवल एक ही होता है अगर पहले कफन डाल रखा है फिर किसी ने एक से ज्यादा कफन डाला है तो नाम खण्ड होता है ! 


22. शादी में खाना खा सकते है, लड़के या लड़की की शादी में खाना खाकर आते हैं यह मान कर पैसे दे सकते हैं कि आपने वाहां भोजन खाया हैं ।


23. यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो पीलिया देना, छुछक देना बन्द करना है । एक पक्ष अनुपदेशी है तो केवल एक २ जोडी कपड़े केवल जच्चा व बच्चे के देने हैं ।


24. नौकरी पर आॅफिस में जब कोई रिटायर होता है तो आॅफिस में सभी आपस में पैसे इकठ्ठे करके उसे Gift तथा पार्टी देते हैं ऐसा कर सकते हैं । (इसमें थोडा बहुत दे सकते हैं) लेकिन उपदेशी ने कतई नहीं लेना है । 


25. घर में जब बहन आती है तो उसे कपड़े व पैसे नहीं देने हैं । अगर बहन या बेटी अनुपदेशी है तो बहुत कम एक २ जोडी कपडे दे सकते है । बच्चों के लिए खाने पीने का सामान दे सकते हैं और अगर जब बहन के घर जाते हैं तो साथ में बच्चों के लिए फल, मिठाई आदि ले जा सकते हैं । 


26. स्कूल में विदाई पार्टी के समय बच्चे पैसे दे सकते हैं ।

 27. गौशाला में पैसा नहीं, चारा आदि दे सकते हैं । 


28. शादी की मिठाई कोई घर में लेकर आए तो और कुछ शादी के नाम के कार्ड के साथ मिठाई लाते हैं तो हृदय से मना करें । फिर भी कोई रख जाए तो खा सकते हैं उस के बदले में कुछ रूपये आश्रम में दान कर दें । आप पर भार नहीं रहेगा। अगर उपदेशी परिवार शादी में मिटाई बनाए तो वो आई हुई रिश्तेदारी या बहन को मिठाई बांधकर दे सकते है, परन्तु यह मिठाई बनाने की परम्परा ही गलत है सामान्य भोजन बनाऐं जैसे अतिथि का सत्कार करने के लिए बनाते हैं खीर, खाण्ड हल्वा बना सकते हैं । 


29. भगत भाई आपस में उधार सामान एक दूसरे से ले सकते हैं और अगर आपस में एक दूसरे के घर आते जाते हैं तो बच्चों के लिए खाने पीने का सामान ले जा सकते हैं । 


30. भाई या बहन की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो आर्थिक या अन्य मदद उधार रूप में कर सकते हैं । बहन को चाहिए कि उस पैसे को लौटाए जिस से उस पर भार नहीं बनेगा । यदि बहन धन लौटाने में असमर्थ है तो' भाई कभी बहन पर पैसे लौटाने का दबाब न बनाए । 


31. लड़की की शादी में माता पिता अपनी लड़की को एक दो जोड़ी कपड़े दे सकते हैं पैसे नहीं, अगर लड़के की शादी में लड़की वाले बगैर नाम वाले है और वो अगर जबरदस्ती अपनी लड़की को कुछ देना चाहे तो इसी प्रकार लड़की की शादी में लड़के वाले अनउपदेशी कुछ मांग करे तो स्पष्ट मना कर दें बिल्कुल नहीं लेना देना हैं । 


32. जिन लडकियों का विवाह होता है वे जिन कपड़ो को पहन कर विवाह मण्डप अर्थात रमैणी में बैठे उन्हीं कपड़ों में अपनी ससुराल जाऐं । अन्य पोशाक न बदले किन्हीं परिस्थितियों में बदलनी पडें (जैसे मिट्टी लग जाए' गीली हो जाए या अन्य कारण से खराब हो जाए) तो बदल सकतें हैं । अन्यथा नहीं । देखने में आया है कि कुछ बहनें रमैणी में विवाह के समय सामान्य पोषाक पहनती है‘ बाद ने तड़क भड़क वाली पोषाक पहन कर ससुराल जाती है' 

वह मर्यादा के विरूद्ध है । विवाह के समय जैसी भी नई या' पुरानी पोषाक पहन रखी है, उसी को पहन कर ससुराल जाऐ, अन्य या उपरोक्त परिस्थितियों मे' पोषाक बदली जा सकती है । 


33 आपके द्वार पर कोई भिक्षुक आता या कहीं बाजार में आप से कोई भिक्षा माँगता है तो उसे पैसे न दें खाना खिला दें । यदि उसको वस्त्र की आवश्यकता है तो वस्त्र बिना सिला न दें, पुराना या नया सिला हुआ कपड़ा दें ' कम्बल या चादर भी पुराना दें नहीं तो अधिकतर भिक्षुक शराबी कवाबी हैं, नए कपडों को बेचकर शराब आदि नशीली वस्तुओं का प्रयोग करते हैं वह दोष दान करने वाले को भी लगेगा । एक श्रद्धालु ने कहा कि यह अच्छा सा नहीं लगता कि भिक्षुक को रूपये न दें, आत्मा नहीं मानती? उस के लिए उत्तर तथा एक उदाहरण यह है कि एक भद्रपुरूष ने एक भिखारी को 1०० रूपयों की भिक्षा दे दी । पहले वह भिक्षुक पाव शराब पीता था अपनी पत्नी व परिवार को परेशान करता था । उस दिन 100  रूपये प्राप्त होने के कारण उस भिखारी ने आधा बोतल शराब पी ली । शराब के नशे में अपनी पत्नी को पीट डाला । उस भिखारी की पत्नी ने बच्चों समेत आत्महत्या कर लीं । उस जैनटलमैन के सौ रूपये के दान ने एक परिवार को उजाड दिया । इसका दोष दानकर्ता को है । गीता में लिखा है कि कुपात्र को किया दान लाभ के स्थान पर हानि करता है । कबीर परमेश्वर जी कहतें हैं : 


गुरु बिन माला फेरते गुरु बिन देते दान । गुरु बिन दोनों निस्फल हैं, पूछो वेद पुरान । । 


34. किसी भी नियम के खण्डित हो जाने पर आप को परमेश्वर से मिलने वाला लाभ बन्द हो जाएगा। जैसे बिजली का कनैक्शन कट जाने पर सर्व लाभ बन्द हो जाते हैं । जो कार्य बिजली से होने थे वे रूक जाते हैं । इसी प्रकार परमात्मा की शक्ति से जो आपको तथा आपके परिवार को लाभ मिलना था वह रूक जाता है । एक बहन ने बताया कि उसके पति ने दीक्षा भी ले रखी है किसी भी नियम का पालन नहीं करता । इसी प्रकार एक भक्त ने अपनी पत्नी की शिकायत की । उसके विषय में यह जाने कि उनका नाम खण्डित हो चुका है ऐसे व्यक्तियों का कोई भयंकर पाप कर्म है । नाम खपिडत होने पर वह पापकर्म अपना प्रभाव करके हानि करेगा जब तक मर्यादा में रहकर भक्ति करते हैं तो वह पाप कर्म हानि नहीं कर सकता । 


एक बहन ने ऐसे ही नाम खपिडत कर रखा था कुछ वर्षों के पस्चात् उसकी जीभ में केंसर का रोग हो गया उस  बहन से पूछा कि क्या अब आपको टीवी. देखना, लिपिस्टीक लगाना अच्छा लगता है? उसने रोते हुए कहा नहीं-नहीं । 


इसी प्रकार परिवार व शरीर में हानी से बचने के लिए तथा परमात्मा से लाभ प्राप्त करके मोक्ष प्राप्ति के लिए मर्यादा में रहे अन्यथा पाप कर्म आपको क्षति कर देगा । 


इसलिए सर्व मुपयात्माओं से पुनः निवेदन है कि सर्व नियमों का विधीवत् पालन करके मानव जीवन को सफल बनाये तथा पूर्ण मोक्ष प्राप्त करके सदा सुखी बने, सतलोक में निवास करें । 


जो विद्यार्थी शिक्षा समय में मौज मरती करते हैं वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं आजीवन कष्ट उठाते हैं । जो शिक्षा के समय मे मौज मस्ती न करके लगन से शिक्षा पूरी कर जाते है तो उनको विद्यालय में किये प्रयत्न का फल बाहर क्षेत्र में नौकरी द्वारा प्राप्त होता है । इसी प्रकार सर्व मानव परमात्मा प्राप्ति के विद्यालय में विद्यार्थी (भक्त) हैं । जो भक्त मौज मस्ती करते हैं । भक्ति तथा नियमों का पालन न करके अन्य प्राणियों के शरीरों में घोर कष्ट उठायेंगे । जो लगन के साथ मर्यादा में रहकर परमेश्वर कबीर जी की भक्ति साधना जगत गुरु संत रामपाल जी महाराज से प्राप्त करके आजीवन करते रहेंगे उनको सत्यलोक में सर्व सुविधाएँ प्राप्त होगी वहाँ वृद्ध अवस्था नहीं है मृत्यु भी नहीं होती ऐसा ही जीवन है, नर-नारी व परिवार है वह कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता । इसलिए सत्य भक्ति करके अपना जीवन सफल बनायें । जिस सत्य भक्ती से आपको यहां भी सर्व आवश्यक सुख सुविधायें प्राप्त होंगी तथा पूर्ण मोक्ष भी 


मिलेगा। 🙏🙏


Dharm

 नन बनते समय लडकियाँ क्या शपथ लेती हैं ?🤔     जनवरी में मैं गोवा गया था... तो शौंक़िया तौर पर मैं वहाँ कि एक प्रसिद्ध चर्च भी चला गया था..!...