🙏 🌺भूमिका🌺
अनादि काल से ही मानव परम शांति, सुख व अमृत्व की खोज में लगा हुआ है। वह अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रयत्न करता आ रहा है लेकिन उसकी यह चाहत कभी पूर्ण नहीं हो पा रही है एसा इसलिए है कि उसे इस चाहत को प्राप्त करने के मार्ग का पूर्ण ज्ञान नहीं हैं/ सभी प्राणी चाहते हैं कि कोई कार्य न करना पड़े, खाने को स्वादिष्ट भोजन मिले, पहनने को सुन्दर वस्त्र मिलें, रहने को आलीशान भवन हो, धूमने के लिए सुन्दर पार्क हो, मनोरंजन करने के लिए मधुर-२ संगीत हो, नाचै-गाए, खैले-कूदें, मौजमस्ती मनाए और कभी बीमार न हो, कभी बूढ़े न हो और कभी मृत्यु न होवे आदि २, परनु जिस संसार में हम रह रहे हैं यहां न तो एसा कहीं पर नजर आता है और न ही एला संभव है। क्योंकि यह लोक नाशवान है, इस लोक की हर वस्तु भी नाशवान है और इस लोक का राजा ब्रह्म काल है जो एक लाख मानव सूक्ष्म शरीर खाता है। उसने सब प्राणियों को कर्म-भर्म व पाप पुण्य रूपी जाल में उलझा कर तीन लोक के पिंजरे मैं कैद किए हुए है । कबीर साहब कहते हैं कि -कबीर, तीन लोक पिंजरा भया, पाप पुण्य दो जाल । सभी जीव भोजन भये. एक खाने वाला काल । ।
गरीब, एक पापी एक पुनि आया, एक है सूम दलेल रे । बिना भजन कोई काम नहीं आवै, सब है जम की जेल रे । ।
वह नहीं चाहता कि कोई प्राणी इस पिंजरे रूपी कैद से बाहर निकल जाए। वह यह भी नहीं चाहता कि जीव आत्मा को अपने नीज घर सतलोक का पता चलै । इसलिए वह अपनी त्रीगुणी माया से हर जीव को भ्रमित किए हुए है। फिर मानव को ये उपरोक्त चाहत कहां से उत्पन्न हुई हैं ? यहां एसा कुछ भी नहीं है। यहां हम सबने मरना हैं, सब दुखी व असान्त हैं/ जिस स्थिति को हम यहां प्राप्त करना चाहते हैं एसी स्थिति में हम अपने निज घर सतलोक में रहते थे/ काल ब्रह्म के लोक में स्वइच्छा से आकर फंस गए और अपन नीज घर का रास्ता भूल गए / कबीर साहब कहते हैं कि -
इच्छा रूपी खेलन आया, ताते सुख सागर नहीं पाया ।
इस काल ब्रह्म के लोक में शांति व सुख का नामोनिशान भी नहीं है। त्रिगुणी माया से उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, लाभ हानि, मानबड़ाई रूपी अवगुण हर जीव को परेशान किए हुए हैं/ यहा" एक जीव दूसर जीव को मार कर खा जाता है, शोषण करता है, ईज्जत लूट लेता है, धन लूट लेता हैं, शांति छीन लेता है/ यहा' पर चारों तरफ आग लगी है/ यदि आप शांति से रहना चाहोगे तो दूसरे आपको नहीं रहने देंगे/ आपके न चाहते हुए भी चोर चोरी कर ले जाता है, डाकू डाका डाल ले जाता हैं, दुर्घटना घट जाती है, किसान की फसल खराब हो जाती है, व्यापारी का व्यापार ठप्प हो जाता है, राजा का राज छीन लिया जाता है, स्वस्थ शरीर में बीमारी लग जाती है अर्थात् यहा' पर कोई भी वस्तु सुरक्षित नहीं है / राजाओं के राज, इज्जतदार की इज्जत, धनवान का धन, ताकतवर की ताकत और यहां तक की हम सभी के शरीर भी अचानक छीन लिए जाते हैं/ मातापिता के सामने जवान बेटा-बेटी मर जाते हैं, दूध पीते बच्चों को रोते बिलखते छोड़ कर माता पिता मर जाते हैं, जवान बहनें विधवा हो जाती हैं और पहाड़ से दुखों को भोगने को मजबूर होते हैं/ विचार करें कि क्या यह स्थान रहने के लायक है ? लेकिन हम मजबूरी वश यहां रह रहे हैं क्योंकि इस काल के पिंजरे से बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता और हमें दूसरों को दुःखी करने की व दुख सहने की आदत सी बन गई/ यदि आप जी को इस लोक में होने वाले दुखों से बचाव करना है तो यहां के प्रभु काल से परम शक्ति युक्त परमेश्वर (परम अक्षर ब्रह्म) की शरण लेनी पड़ेगी। जिस परमेश्वर का खौंफ काल प्रभु को भी है/ जिस के डर से यह उपरोक्त कष्ट उस जीव को नहीं दे सकता जो पूर्ण परमात्मा अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म (सत्य पुरूष) की शरण पुर्ण संत के बताए मार्ग को ग्रहण करता है। वह जब तक संसार में भक्ति करता रहेगा, उसको उपरोक्त कष्ट आजीवन नहीं होते । जो व्यक्ति इस पुस्तक "ज्ञान गंगा" को पढ़ेगा उसको ज्ञान हो जाएगा कि हम अपने नीज घर को भूल गए हैं। वह परम शांति व सुख यहा' न होकर निज घर सतलोक में है जहां पर न जन्म है, न मृत्यु है, न बुढ़ापा, न दुख, न कोई लड़ाई-झगड़ा हैं, न कोई बिमारी हैं, न पैसे का कोई लेन-देन है, न मनोरंजन के साधन खरीदना है/ वहा पर सब परमात्मा द्वारा निःशुल्क व अखण्ड है/ बन्दी छोड़ गरीबदास जी महाराज की वाणी यें प्रमाण है कि :बीन ही मुख सारंग राग सुन. बीन ही तंती तार । बिना सुर अलगोजे बाजै, नगर नाच घुमार । । घंटा बाजै ताल नग, मंजीरे डफ झांझ । मुरली मधुर सुहावनी. निसवार और सांझ । । बीन विहंगम बाजहिं, तरक तम्यूरे तीर । राग खण्ड नहीं होते है, बंध्या रहत समीर । । तरक नहीं तोरा नही. नाही कशीस कबाब । अमृत प्याले मध पीवै. ज्यो भाटी चबै शराबा । मतवाले मस्तानपुर, गली…२ गुलजार । संख शराबी फिरत है, चली तास बजार । । संख-संख पत्नी नाचै, गावै शब्द सुभान । चद्र बदन सूरजमुखी, नाही मान गुमान । । संख हिंडोले नूर नग, झूले सत हजूर । तख्त धनी के पास कर, ऐसा मुलक जहूर । । नदी नाव नाले बगै, छुटै फुहारे सुन्न । भरे हौद सरवर सदा, नहीं पाप नहीं पुण्य । । ना कोई भिक्षुक दान दे, ना कोई हार व्यवहार । ना कोई जन्मे मरे. ऐसा देश हमार । । जहा संखो। लहर मेहर की उपजै, कहर जहा नहीं कोई । दासगरीब अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई । ।
सतलोक में केवल एक रस परम शांति व सुख है/ जब तक हम सतलोक में नहीं जायेंगे तब तक हम परमशांति, सुख व अमृत्व को प्राप्त नहीं कर सकते/ सतलोक में जाना तभी संभव है जब हम पुर्ण संत से उपदेश लेकर पूर्ण परमात्मा की आजीवन भक्ति करते रहें। इस पुस्तक "ज्ञान गंगा" के माध्यम से जो हम संदेश देना चाहते हैं उसमें किसी देवी देवता व धर्म की बुराई न करके सर्व पवित्र धर्म ग्रंथों में छुपे गुढ रहस्य को उजागर करके यथार्थ भक्ति मार्ग बताना चाहा है जो कि वर्तमान के सर्व संत, महंत व आचार्य गुरु साहेबान शास्त्रों में छिपे गूढ रहस्य को समझ नहीं पाए/ परम पूज्य कबीर साहेब अपनी बाणी में कहते हैं की 'वेद कतेब झूठे ना भाई, झूठे हैं सो समझे नाही ।
जिस कारण भक्त समाज को अपार हानि हो रही है/ सब अपने अनुमान से व झुठे गुरुओं द्वारा बताई गई शास्त्र विरुद्ध साधना करते हैं। जिससे न मानसिक शांति मिलती है और न ही शारीरिक सुख, न ही घर व काररेबार में लाभ होता है और न ही परमेश्वर का साक्षात्कार होता है और न ही मोक्ष प्राप्ति होती है/ यह सब कुछ कैसे मिले तथा यह जानने के लिए कि मैं कौन हूँ, कहां से आया हूँ, क्यों जन्म लेता हूँ, क्यों मरता हूँ और क्यों दुख भोगता हूँ ? आखिर यह सब कौन करवा रहा हैं और परमेश्वर कौन है, कैसा है, कहां है तथा कैसे मिलेगा और ब्रह्मा, विष्णु और शिव के माता पिता कौन हैं और किस प्रकार से काल ब्रह्म की जेल से छुटकारा पाकर अपने नीज घर सतलोक में वापिस जा सकते हैं यह सब इस पुस्तक के माध्यम से दर्शाया गया है ताकि इसे पढ़कर आम भक्त आत्मा का कल्याण संभव हो सके यह पुस्तक सतगुरु रामपाल जी महाराज के प्रवचनों का संग्रह है। जोकि सदग्रंथों में लिखे तथ्यों पर आधारित है हमें पूर्ण विश्वास है कि जो पाठक जन रुचि हुआ निष्पक्ष भाव से पढ़कर अनुसरण करेगा उसका कल्याण संभव है।
:- आतम प्राण उद्धार ही ऐसा धर्म नहीं और कोटी अश्वमेघ यज्ञ सकल समाना भौर जीव उद्धार परम पुण्य ऐसा कर्म नहीं और मरुस्थल के मृग ज्यों, सब मर गए दौड़ दौड़ ।।
भावार्थ _ यदि एक आत्मा को सत भक्ति मार्ग पर लगाकर उसका आत्म कल्याण करवा दिया जाए तो करोड़ अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है और उसके बराबर कोई भी धर्म नहीं है जीवात्मा के उद्धार के लिए किए गए कार्य अर्थात सेवा से श्रेष्ठ कोई भी कार्य नहीं है अपने पेट भरने के लिए तो पशु-पक्षी भी सारा दिन भ्रमते हैं उसी तरह वह व्यक्ति है जो परमार्थी कार्य नहीं करता परमार्थी कर्म सर्वश्रेष्ठ सेवा जीव कल्याण के लिए किया कर्म है जीव कल्याण का कार्य ना करके सर्व मानव मरुस्थल के हिरण की तरह दौड़ दौड़ कर मर जाते हैं जिसे कुछ दूरी पर जल ही जल दिखाई देता है और वह दौड़ कर जाने पर थल ही प्राप्त होता है फिर कुछ दूरी पर थल का जल दिखाई देता है अंत में उस हिरण की प्यास से ही मृत्यु हो जाती है ठीक इसी प्रकार जो प्राणी इस लोक में जहां हम रह रहे हैं वे उस हिरण के समान सुख की आशा करते हैं जैसे निसंतान सोचता है संतान होने पर सुखी हो जाऊंगा संतान वालों से पूछे तो उनकी अनेकों समस्याएं सुनने को मिलेगी निर्धन व्यक्ति सोचता है कि धन हो जाए तो मैं सुखी हो जाऊं जब धनवानो की कुशल जानने के लिए प्रश्न करोगे तो ढेर सारी परेशानियां सुनने को मिलेगी कोई राज्य प्राप्ति से सुख मानता है यह उसकी महा भूल है राजा मंत्री मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को स्वप्न में भी सुख नहीं होता जैसे चार पांच सदस्यों के परिवार का मुखिया अपने परिवार के प्रबंधन में कितना परेशान रहता है राजा तो एक क्षेत्र का मुखिया होता है उसके प्रबंधन में सुख स्वप्न में भी नहीं होता राजा लोग शराब पीकर कुछ गम भुलाते हैं माया इकट्ठे करने के लिए जनता से कर लेते हैं फिर अगले जन्मों में जो राजा सत भक्ति नहीं करते पशु योनियों को प्राप्त होकर प्रत्येक व्यक्ति से वसूले करके उनके पशु बनकर लौटाते हैं जो व्यक्ति मन मुखी होकर तथा झूठे गुरुओं से दीक्षित होकर भक्ति तथा धर्म करते हैं वह सोचते हैं कि भक्ति में सुख होगा लेकिन इसके विपरीत दुख ही प्राप्त होता है कबीर साहेब कहते हैं कि मेरा यह ज्ञान ऐसा है कि यदि ज्ञानी पुरुष होगा तो इसे सुनकर ह्रदय में बसा लेगा और यदि मूर्ख होगा तो उसकी समाज से बाहर है
कबीर ज्ञानी सुने तो हृदय लगाई मूर्ख सुने तो गम ना पाए
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