शुक्रवार, 21 मई 2021

Dharm

 नन बनते समय लडकियाँ क्या शपथ लेती हैं ?🤔


    जनवरी में मैं गोवा गया था... तो शौंक़िया तौर पर मैं वहाँ कि एक प्रसिद्ध चर्च भी चला गया था..! मुझे भी जरा कुछ ज्यादा ही आनन्द आता है धर्म पर चर्चा में और वहाँ उनकी प्रार्थना एवं अन्य कुछ बातों में अपनी रूची दिखानी शुरु की🤔 । वहां एक ईसाई... जो कि.. वेश-भूषा से कोई फादर टाईप ही लग रहा था..., मेरे गले मे जनेऊ देख कर समझ गया कि... मैं एक हिन्दू हूँ...! इसीलिये.... उसने मुझे भी ईसाई बनाने और शीशे में उतारने के लिए कहा कि...🤔


देखो बेटे... बुरा मत मानना... लेकिन दरअसल... सच पूछो तो... हिन्दू धर्म और इस्कॉन पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाना चाहिये...


क्योंकि... यह श्रीकृष्ण को महिमा मंडित करते हैं... जबकि श्रीकृष्ण ने 16108 विवाह किये थे....

जिससे सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण एक चरित्रहीन व्यक्ति थे...! इसीलिये... यीशु ही तुम्हे सही राह दिखा सकते हैं...!


उसकी... बातें सुनते ही मेरे तन-बदन में आग लग गयी परन्तु... ऊपरी तौर पर... मैंने उसे बहुत ही शांतचित्त से बोला...


देखिये पादरी जी.... मैं आपको अपना फादर तो बोल नहीं सकता... क्योंकि.... मैं कोई सेक्यूलर नहीं बल्कि सनातनी हूँ, और...हिन्दुओं का एक ही बाप होता है... आप ईसाईयों की तरह हर चर्च में हमारे बाप यानि कि फादर नहीं होते हैं...! और, जहाँ तक रह गयी बात भगवान कृष्ण की शादियों की... तो.., आप सिर्फ मुझे इतना बता दो कि....


आपके इस कथित रूप से पवित्र ईसाई धर्म में... नन बनते समय लडकियाँ क्या शपथ लेती है..🤔


मेरे इतना कहते ही वो मेरा मुंह देखने लगा... परन्तु कुछ नहीं बोला....! मैंने उससे दो तीन बार वही सवाल पूछे... परन्तु वो चुप रहा...!


अंततः ... मैंने उससे कहा...

कोई बात नहीं पादरी जी... मैं बता देता हूँ.... पूरे विश्व में नन बनते समय कुंवारी लडकियाँ यह शपथ लेती है कि


"मै जीजस को अपना पति स्वीकार करती हूँ और उनके अलावा किसी अन्य पुरुष से शारीरिक सम्बन्ध नहीं बनाऊँगी"


तो कृपया... अब आप मुझे बतायें🤔 कि... आज से पहले कितनी लाख ननों ने जीसस से विवाह किया और भविष्य में भी ना जाने कितनी ननें विवाह करेंगी..!


तो... आपकी बात को आप पर ही लागू करते हुये... क्यों ना, सबसे पहले पूरे विश्व में ईसाईयों और ईसाई धर्म

पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाये.......🤔


उसके बाद वो पादरी मुझे कुछ नहीं बोला और चुप-चाप सर झुका कर मेरे पास से चला गया... !


तो..... पूरी कहानी का सार यह है कि.... सिर्फ खुद के ही घर को जानना पर्याप्त नहीं होता है.... अडोस-पड़ोस की जानकारी भी रखा करें... ताकि लोगों को मुंह तोड़ जवाब

दिया जा सके...!

मंगलवार, 30 मार्च 2021

श्रीमद् देवीभागवत


पहला स्कंध / पृष्ठ 38 

 सौनकजी _ यह वेद के समान आदरणीय है |

धिक्कार है इस अमृत को जिसे पीने वाले कभी मुक्त नहीं हो सकते किंतु धन्य है यह पुराण जो सुनने से ही मनुष्य को मुक्त कर देता है अमृत पान करने के लिए हमने हजारों यज्ञ किए किंतु फिर भी हमें शांति ना मिल सकी क्योंकि यज्ञों का फल स्वर्ग है स्वर्ग भोगने के पश्चात वहां से गिरना ही पड़ता है इस प्रकार यह संसार चक्र में आने-जाने की क्रिया सदा चलती ही रहती है सूत जी इस त्रिगुणात्मक जगत में कालचक्र की प्रेरणा से सदा चक्कर काटने वाले मनुष्यों को ज्ञान हुए बिना मुक्ति मिलनी कभी संभव नहीं

सुतजी __ सूत जी का नैमिष्यारण में पहुचना शौनक ॠषीयों को देवीभागवत का ज्ञान बताना 

व्यासजी___ मेरे मनोरथ पूर्ण करें एवं वर्ग देने में निपुण कौन देवता है जिनकी मैं उपासना करूं भगवान विष्णु शंकर इंद्र ब्रह्मा सूर्य गणेश स्वामी कार्तिकेय अग्नि अथवा वरुण मुझे किन की उपासना करनी चाहिए इस प्रकार व्यास जी के पूछने पर नाराज जी कहने लगे

 नारदजी __ व्यास जी तुम इस विषय में जो पूछ रहे हो ठीक है ही प्रश्न मेरे पिताजी ने भगवान श्रीहरि से किया था

ब्रम्हा जी __ प्रभु आप देवताओं के अध्यक्ष जगत के स्वामी और भूत भविष्य एवं वर्तमान सभी जीवो के एकमात्र शासक हैं फिर आप क्यों तपस्या कर रहे हैं और किस देवता की आराधना में ध्यान मांगना है आप जैसे समर्थ पुरुष से बढ़कर कौन विशिष्ट देवता है त्रिलोकी में आपसे बढ़कर किसी देवता को मैं नहीं देखता मुझे दास को यह रहस्य स्पष्ट बताने की कृपा कीजिए

 भगवान श्री हरि विष्णु ___ ब्रह्मा सावधान होकर सुनाओ मैं अपने मन का विचार व्यक्त करता हूं देवता दानव और मानव सब यही जानते हैं कि तुम सृष्टि करते हो मैं पालन करता हूं और शंकर संघार किया करते हैं किंतु फिर भी वेद के पार गांव में पुरुष अपनी युक्ति से यह सिद्ध करते हैं कि रचने पालने और संघार करने की योग्यता जो हमें मिली है लिक की अधिष्ठात्री शक्तिदेवी है वे कहते हैं कि संसार की सृष्टि करने के लिए तुम्हें राज्य सी शक्ति का संचार हुआ है मुझ में सात्विक की शक्ति मिली है और रूद्र में तामसी शक्ति का आविर्भाव हुआ है उस शक्ति के अभाव में तुम इस संसार की सृष्टि नहीं कर सकती मैं पालन करने में सफल नहीं हो सकता और रुद्र से संघार कार्य होना भी संभव नहीं है ब्रह्मा जी हम सभी को शक्ति के सहारे ही अपने कार्य में सदा सफल होते आए हैं सूरत प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों उदाहरण मैं तुम्हारे सामने रखता हूं सुनो यह निश्चय है कि उस शक्ति के अधीन होकर ही में प्रलय काल में इस शेषनाग की शैया पर सोता हूं और सृष्टि करने का अवसर पाते ही जाग जाता हूं

मुझे सब प्रकार से शक्ति के अधीन होकर रहना पड़ता है उन्हीं भगवती शक्ति का मैं निरंतर ध्यान किया करता हूं ब्रह्मा जी मेरी जानकारी में इन भगवती शक्ति से बढ़कर दूसरे कोई देवता नहीं है

  सौनकादिक ऋषि यों ने पूछा__ महा भागवत जी इस कथा प्रसंग को जानकर हमें बड़ा ही आश्चर्य हो रहा है क्योंकि वेद शास्त्र पुराण और यज्ञ जनों ने सदा यही निर्णय किया है कि ब्रह्मा विष्णु और शंकर यही तीनों सनातन देवता है इन से बढ़कर इस ब्रह्मांड में दूसरा कोई देवता है ही नहीं ब्रह्माजी सारे संसार की सृष्टि करते हैं जगत का संरक्षण भगवान विष्णु के अधीन है प्रलय के अवसर पर शंकर जी उसका सहार किया करते हैं इस जगत प्रपंच के यही तीनों देवता कारण है यह वास्तव में एक ही है किंतु कार्य व सत्व रज और तम आदि गुणों को स्वीकार करके ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर नाम से विख्यात होते हैं इन तीनों में परम पुरुष भगवान विष्णु सबसे श्रेष्ठ हैं वह जगत के स्वामी और आदि देव करवाते हैं उनमें सब कुछ करने की योग्यता है दूसरा कोई भी देवता उन अतुल तेजस्वी श्री विष्णु के समान शक्तिशाली नहीं है फिर ऐसे समर्थ प्रभु भगवान श्री विष्णु योग माया के अधीन होकर कैसे सो गए महा भाग हमें यह महान संदेह हो रहा है कि इस मंगलमय प्रसंग को सुनने की कृपा कीजिए सूरत आप पहले जिसकी चर्चा कर चुके हैं तथा जिसने परम प्रभु श्री विष्णु भी अधिकार जमा लिया है वह कौन सी शक्ति है कहां से उसकी सृष्टि हुई उसमें कैसे इतना पराक्रम हो गया और क्या उसका परिचय है सब बताने की कृपा करें जो सबके स्वामी है जगत के गुरु हैं सर्वोत्तम आत्मा है परम आनंद स्वरूप सच्चिदानंद विग्रह है सब की सृष्टि करते हैं सब का संरक्षण करते हैं रजोगुण से रहित है सर्वत्र विजय सकते हैं एवं परम पवित्र परात्पर है ऐसे सर्वगुण संपन्न भगवान श्री विष्णु विवश होकर कैसे नींद में अचेत हो गए

सुतजी कहते हैं ____ मनियरो चराचर सहित इस त्रिलोकी में कौन ऐसा है जो इस संदेह को दूर कर सके जिस प्रकार गंगा एक ही है किंतु धाराओं के रूप में पृथक पृथक भर्ती है वैसे ही महारथियों का कथन है कि एक ही भगवान विष्णु संपूर्ण देवताओं में विराजमान है प्रत्यक्ष हनुमान और तीसरा शब्द इन तीन प्रमाणों को ही प्रकांड विद्वानों ने सिद्ध किया है नैयायिकोंके सिद्धांतों में उपमान को लेकर 4 प्रमाण कहीं गए हैं हिमांशु को नहीं हर था पति सहित पांच प्रमाण माने हैं पुराण वेद विद्या प्रसाद प्रमाण मांगते हैं जो इन सभी प्रमाणों से नहीं जाना जा सकता वहीं पर ब्रह्म परमात्मा है इस विषय में शास्त्र बुद्धि एवं निश्चयात्मिका युक्ति से बार बार विचार करके हनुमान कर लेना चाहिए

सब में जो शक्ति विराजमान है वहीं आद्यशक्ति है उसी के प्रभाव से शिव भी सीता को प्राप्त होते हैं जिस पर वह शक्ति की कृपा ना हुई वह कोई भी हो सकती है इन हो जाता है सब ने व्यापक रहने वाली जो आ जा सकती है उसकी उसी का ब्रह्म इस नाम से निरूपण किया गया है आते विद्वान पुरुषों को चाहिए कि भली-भांति विचार करके सदा उसी शक्ति की उपासना करें

वही आद्यशक्ति इस अखिल ब्रह्मांड को उत्पन्न करती और उसका पालन भी करती है वही इच्छा होने पर इस चराचर जगत का सहार भी करने में संलग्न हो जाती है ब्रह्मा विष्णु शंकर इंद्र अग्नि और पवन यह सभी किसी प्रकार भी स्वतंत्र रूप से अपने अपने कार्य का संपादन नहीं कर सकते किंतु जब वह आदिशक्ति इन्हें सहयोग देती है तभी अपने कार्य में सफल होते हैं अतः इन कार्य कारणों से यही प्रत्यक्ष सिद्ध होता है कि वह शक्ति ही सर्वोपरि है विज्ञान पुरुष उस शक्ति के विषय में दो प्रकार की कल्पना करते हैं सगुण और निर्गुण वह किच्छा करने वाले सगुना की उपासना करते हैं वीरागियो के यहां निर्गुणा की उपासना होती है वह अध्य शक्ति परब्रह्मा स्वरूपा एवं सनातनी है संपूर्ण शास्त्रों से यही बात निश्चित होती है शक्ति पुरुष चेस्टर रहित हो जाता है या तो प्रत्यक्ष ही दिखाई पड़ रहा है अतः संपूर्ण जगत में शक्ति को ही सर्वोपरि समझना चाहिए ।

  तीसरा स्कंध 128 पृष्ठ

  जनमेजय ने पूछा __ प्रधान देवता सृष्टि विषयक प्रश्न

व्यासजी ___ राजन तुम जो पूछ रहे हो ब्रह्मा जी की उत्पत्ति कैसे हुई सो वह महान कठिन विषय है उसमें अनेक प्रश्न उठ जाते हैं यही प्रश्न पूर्व समय में मैंने नारद जी से किया था की इस विस्तृत ब्रह्मांड के प्रदान करता कौन है मुनव्वर यह महान कहां से उत्पन्न हो गया यह ब्रह्मांड मीणा शील है या थोड़ा सदा रहने वाला है इसकी रचना करने वाला कोई एक है अथवा अनेक यह प्रश्न मेरे मन में उठा करता है

कुछ लोग भगवान शंकर को परम कारण मानकर जगत का रचयिता बताते हैं

दूसरे कई लोग भगवान भी सुन की प्रशंसा किया करते हैं कि वह शक्तिशाली पुरुष अव्यक्त अखिलेश्वर यों से संपन्न परब्रह्म परमात्मा है

कुछ दूसरे लोग ब्रह्मा जी को सृष्टि का प्रधान कारण वह चलाते हैं

कितने लोग इंद्र को प्रधान मानकर यज्ञ में उनकी उपासना करते हैं

कुछ दूसरे संप्रदाय वाले वरुण सॉन्ग अग्नि पवन यम कुबेर एवं गणराज गणेश को प्रधान देवता मानते हैं

कितने आचार्य भवानी को संपूर्ण मनोरथ पूर्ण करने वाली बतलाते हैं वी आदिमाया महाशक्ति एवं परम पुरुष के साथ रहकर कार्य संपादन करने वाली प्रकृति है ब्रह्म के साथ उनका अभेध संबंध है

 कितने श्रेष्ठ मुनि कहते हैं कि जो निरंजन निराकार निर्लेप निर्गुण अरुण एवं व्यापक ब्रह्म है उन्हीं से जगत की सृष्टि हुई है कहीं-कहीं वेद और उपनिषद में वही ब्रह्म तीनों में बतलाए गए हैं वह प्रधान पुरुष हैं

कुछ लोग कहते हैं कि यह सारा ब्रह्मांड अन ईश्वर है कभी भी कोई विशिष्ट पुरुष इसकी रचना नहीं करते कोई इसका अधिष्ठाता नहीं है सवाई ढंग से यह उत्पन्न हो जाता है प्रकृति पुरुष भी इसके करता नहीं कहे जाते न्यूता में सभी सत्व गुण विद्यमान हैं उनमें सत्य धर्म की प्रतिष्ठा भी है किंतु दुरात्मा दाना उन्हें सदा पीड़ा पहुंचाया करते हैं फिर धर्म की मर्यादा कहां रहे मेरे वंशज पांडव बड़े धर्मात्मा थे उनके द्वारा सदा धर्म का पालन होता था फिर भी उन्हें भांति भांति के दुखों का सामना करना पड़ा मुनिवर आप शक्तिशाली पुरुष है मेरे मन का संदेश दूर करने की कृपा करें


 व्यासजी कहते हैं जन्मेजय से ___ तुमने जो बातें पूछी है वही मैंने मुनिवर नारद जी से पूछी थी 

नाराजगी कहते हैं __ व्यास जी प्राचीन समय की बात है यही संध्या मेरे हृदय में भी उत्पन्न हो गया था तब मैंने अपने पिता अमित तेजस्वी ब्रह्मा जी के स्थान पर गया और उनसे इस समय जिस विषय में तुम मुझे पूछ रहे हो उसी भी समय मैंने पूछा


130/ ब्रह्मा जी ने कहो ___ बेटा नारद! मैं इस प्रश्न का क्या उत्तर दूं यह प्रश्न बड़ा ही जटिल है महा भाग तुम भगवान विष्णु से ही इसका समुचित समाधान पा सकते हो | महामंत्री संसार में कोई भी राघोपुर जैसा नहीं है जिसे यह रहस्य विदित हो जो त्यागी आकांक्षा रहित एवं विश्वास उन्हें वही किस के सदस्य को जान सकता है पूर्व काल में सर्वत्र जल ही जल था स्थावर जंगम जितने प्राणी हैं इनमें कोई भी नहीं थे तब कमर से मेरी उत्पत्ति हुई मुझे सूर्य चंद्रमा वृक्ष तथा पर्वत कोई भी दिखाई नहीं पड़े मैं कमल की करणीका पर बैठकर विचार करने लगा इस अगाध जल में मैं कैसे उत्पन्न हो गया | यह कमल कैसे उत्पन्न हुआ आप देखो कि यह फोन कहां है जहां वह मूल कारण पंख होगा उसके नीचे पृथ्वी अवश्य होगी यह विचार करके माय जेल में उतरा हजार वर्ष तक पृथ्वी का अन्वेषण करता रहा इस पर भी मुझे उस जगह कहीं और छोड़ नहीं मिला इतने में आकाशवाणी हुई तब करो तब करो तब मैंने तपस्या आरंभ कर दी कमाल कर बैठे हजार वर्ष तक मैं तब करता रहा फिर उसी समय से ऐसी आकाशवाणी हुई सृष्टि करो उसे सुनकर मैं बड़े आश्चर्य में पड़ गया सोचा कि किसकी सृष्टि करूं अथवा मेरा क्या कर्तव्य है | उसी समय मधु और कैटभ नाम की दो राक्षस सामने आ गए युद्ध करने की इच्छा प्रकट करने लगे मैं भयभीत होकर कमल की डंठल पकड़कर जेल में उतरा वह मुझे एक पुरुष के दर्शन मिले वे पीतांबर पानी थे चारभुजा ए थी शेषनाग की शैया पर सोए थे शंख चक्र गदा और पद्म इन चार आयुधों से अनुपम सभा पा रहे थे मुझे भगवान विष्णु के दर्शन हुए वह योग निद्रा में सोए हुए थे इतने में भगवती योगनिद्रा याद आ गई मैंने उनका स्तवन किया भगवती श्री विष्णु के विग्रह से निकालकर आकाश में विराज नहीं लगी तब तुरंत ही श्रीहरि उठ बैठे | उन्होंने मधु और कैडर के साथ 5000 वर्षों तक बड़ी घमासान लड़ाई की तब वे दैत्य मरे पहले देवी के कटाक्ष से मधु और कैटभ मोहित हो गए थे इसके बाद भगवान विष्णु ने गोद में लिटा कर उन्हें मारा | अब वहां मैं और भगवान विष्णु दो थे वही रूद्र भी प्रगट हो गए हम तीनों को भगवती आदिशक्ति के दर्शन हुए देवी की स्तुति की


देवी ने कहा___ ब्रह्मा विष्णु और महेश्वर तुम भली-भांति जहां सावधान होकर अपने अपने कार्य में संलग्न हो जाओ उस रिश्ते स्थिति और संहार यह तुम्हारे कार्य है इन महान पराक्रमी लड़कियों का निधन हो जाने पर अब तुम्हें अपना स्थान बना कर शांतिपूर्वक निवास करना चाहिए तुम अब अपने सामर्थ्य से चार प्रकार की प्रजा उत्पन्न करो |

ब्रम्हा ___ माता हम किस प्रकार इन पदों के सृजन आदि कार्य करने में सफल हो

देवी जी ___ देवताओं निर्भीक होकर इच्छा पूर्वक इस विमान में प्रवेश कर जाओ ब्रह्मा विष्णु और रुद्र आज मैं तुम्हें एक अद्भुत दृश्य दिखलाती हूं

 ब्रह्मा ___ उस विमान पर चढ़कर हम आराम से बैठ गए देवी ने अपने सामान से युवान को आकाश में उड़ा दिया मन के समान तीव्र गति से चलने वाला बड़ा विमान जिस अपरिचित स्थान पर गया वह स्वर्ग था 

क्षण भर बाद ही वह एक दूसरे सुंदर प्रदेश मे जा पहुँचा वहां हमने देखा महाभाग्य इंद्र थे उनकी प्राणप्रिया सचि विद्यमान थी उस वर्ग के दृश्य को देखकर हम आश्चर्यचकित हो गए जल के स्वामी वरुण कुबेर यमराज सूर्य और अग्नि आदि देवता भी वहां विराजमान थे वहां के राजा इंद्र ही थे

इतने में हमारा अभिमान तेजी से चल पड़ा और वह दिव्य धाम ब्रह्मलोक में जा पहुंचा |

वहां एक दूसरे ब्रह्मा विराजमान थे उन्हें देखकर भगवान शंकर और विष्णु को बड़ा आश्चर्य हुआ मुझसे पूछने लगे यह अविनाशी ब्रह्मा कौन हैं मैंने उत्तर दिया मुझे कुछ पता नहीं सृष्टि के अधिष्ठाता यह कौन है "भगवान" ! मैं कौन हूं ये कौन है और हमारा उद्देश्य क्या है इस उलझन में मेरा मन चक्कर काट रहा है 

इतने में मन के समान तेरा गांव में वहां विमान तुरंत वहां से चल पड़ा और कैलाश की सुरंग में शिखर पर जा पहुंचा वहां ईमान के पहुंचते ही एक भव्य फोन से त्रिनेत्र धारी भगवान शंकर निकले नंदी वृषभ पर बैठे थे उनके पांच मुख थे और 10 भुजाएं थी महाबली गणेश और स्वामी कार्तिकेय अगर भगत रहकर रक्षा का कार्य संपन्न कर रहे थे उस समय भगवान शंकर तथा उनके अन्य गणों को देखकर हमारे आश्चर्य की सीमा न रही

 क्षण भर के बाद ही वह विमान बैकुंठ लोक में पहुंच गया वहां कमल लोचन श्रीहरि विराजमान थी

इतने में ही पवन से बातें करता हुआ वह विमान तुरंत उड़ गया आगे अमृत के समान मीठे जल वाला समुद्र मिला वही एक मनोहर दीप था उसी बीच में एक मंगलमय मनोहर पलंग बिछा था उस पलंग में सुंदर रत्न जड़े थे हम लोग विमान पर बैठे थे उस पलंग पर अनेकों बिस्तर बिछा इंद्रधनुष के समान वह चमक रहा था उस उत्तम पलंग पर एक दिव्य रमणी बैठी थी उन भगवती भुनेश्वरी आभूषण से सुशोभित थे

कुछ समय तक हम वही ठहरे रहे आपस में कहने लगी__ यह सुंदरी कौन है और इसका क्या नाम है हम इसके विषय में बिल्कुल अनभिज्ञ हैं 

134/ यों संदेह ग्रस्त होकर हम लोग वहां रुके रहे तब भगवान


134/विष्णु__ ने उन भगवती को देखकर विवेक पूर्वक निश्चय कर लिया कि वे भगवती जगदंबिका है |

 उन्होंने कहा कि ये भगवती हम सब की आदि कारण हैं | ये सबकी आदिजननी है प्रलय काल में अखिल जगत को समेट लेती है |

महाविद्या और महामाया इनके नाम हैं ये पूर्ण प्रकृति है |

135/ ये मूल प्रकृति है | सदा परम पुरुष के साथ रहती है ब्रह्मांड की रचना करके परम पुरुष को यह दिखाया करती है | परम पुरुष दृष्टा है यह चराचर जगत दृश्य है और उन परम पुरुष की यह आदि शक्ति महामाया सब की अधिष्ठात्री देवी है यह संपूर्ण संसार की कारण है | ये वे ही दिव्यांगना है जिनके प्रलयवरण में मुझे दर्शन हुए थे | उस समय मैं बालक रूप में था मुझे पालने पर यह झूला रही थी | वटवृक्ष के पत्र पर एक सैयां बिछी थी उस पर लेट कर मैं पैर के अंगूठे अपने कमल जैसे मुंह में लेकर को चूस रहा था तथा बालक की तरह अनेक चेष्टा करके खेल रहा था | मेरे सभी अंग अत्यंत कोमल थे मैं बालक बनकर सोया था और यह देवी गा गाकर मुझे सुलाती थी वे ही यह देवी है |

इन्हें देख कर मुझे पहले की बात याद आ गई यह हम सब की जननी है |

  ब्रह्मा जी कहते हैं __ भगवान विष्णु के कहने पर मुझे और शंकर को बड़ी प्रसन्नता हुई भगवती के पास जाना हम लोगों ने सर स्वीकार कर लिया हां चलना चाहिए यों श्रीहरि से कहकर हम सभी विष्णु और शंकर तीनों द्वार के पास जाकर युवान से नीचे उतरे जब देवी ने हम सभी को धार पर देखा तभी मुस्कुरा कर हंसने लगी और तुरंत हम तीनों को इस्त्री बना दिया भगवती के नाक में ही मुझे स्थावर जंगम सारा ब्रह्मांड ब्रह्मा विष्णु और उद्योग आयोग ने यमराज सूर्य चंद्रमा वरुण कुबेर विंध्य पर्वत समुद्र नदिया गंधर्व अप्सराएं सब के सब दिखाई पड़े वही मेरा जन्म स्थान कमल था उसी पर मैं चार मुख वाला ब्रह्मा बैठा था जय साईं भगवान विष्णु दिखाई पड़ रहे थे मधु कैटभ भी दृष्टिगोचर हुए स्त्री वश में परिणित श्री विष्णु ने भगवती भुनेश्वरी की स्तुति आरंभ कर दी


भगवान विष्णु बोले __ माता मैं जान गया यह संपूर्ण संसार तुम्हारे भीतर विराजमान है इस जगत की सृष्टि और संघार तुम्हीं से होते हैं तुम्हारी ही व्यापक माया इस संसार को सजाती है

माता__ जब मैं शंकर और ब्रह्मा भी तुम्हारे अचिंत्य प्रभाव से परिचित हैं तब दूसरा कौन है जो उसे जान सके

 जगदंबा__ तुम जगत के संपूर्ण प्रपंच को जानती हो क्योंकि सारे ज्ञान की अंतिम सीमा तुम ही में समाप्त हो गई है

 तुम शुद्ध स्वरूपा हो यह संसार तुम ही से उठ भाषित हो रहा है मैं ब्रह्मा और शंकर हम सभी तुम्हारी कृपा से विद्यमान हैं हमारा अवीरभाव और तिरोभाव हुआ करता है केवल तुम ही नित्य हो जगत जननी हो प्रकृति और सनातनी देवी हो


शंकरजी __ देवी यदि महा भाग विष्णु तुम्ही से प्रकट हुए हैं तो उनके बाद उत्पन्न होने वाले ब्रह्मा भी तुम्हारे ही बालक हुए फिर मैं तमोगुणी लीला करने वाला शंकर क्या तुम्हारी संतान नहीं हुआ अर्थात मुझे भी उत्पन्न करने वाली तुम ही हो शिविर संपूर्ण संस्कार की सृष्टि करने में तुम बड़ी चतुर हो

 इस संसार की सृष्टि स्थिति और संहार करने में तुम्हारे गुण सदा समर्थ है उन्हें तीनों गुणों से उत्पन्न हम ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर नियमानुसार कार्य में तत्पर रहते हैं


 ब्रह्मा जी__ देवी जो तुम्हारे पावन चरित्र को पूरा नहीं जानते वही माना मुझे प्रभु बताया करते हैं संसार के सृजन की लीला करने के लिए तुमने मुझे ब्रह्मा के पद पर नियुक्त किया और मेरे द्वारा अंडज, पिण्डज, स्वेतज, और उभ्दिज्ज यह चार प्रकार के प्राणी बनवाए

तुम्हारी कहीं उत्पत्ति हुई है यह प्रसंग ना देखा गया है और ना सुना ही गया है तुम्हारी उत्पत्ति कहां से हुई है इसे कोई नहीं जानता जगत में कोई भी तुम्हारे रहस्य से परिचित नहीं है / 140

इस मूर्त और अमूर्त जगत का आधार तुम से पूर्व कोई भी दूसरा पुरुष नहीं था कोई तीसरा भी नहीं है

 "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म" इस वेद के वचन को व्यर्थ कहना तो बनता नहीं और इधर अनुभव दूसरी बात कहता है इस प्रकार वेदवाक्यों और अनुभव में अत्यंत विरोध उत्पन्न हो रहा है वेद कहते हैं "एकमेवादित्यं ब्रह्म (ब्रह्म एक) है तो क्या वह आत्म स्वरूप तुम ही हो अथवा वह कोई और ही पुरुष है___ मेरे इस संदेह को दूर करने की कृपा करो | तुम स्त्री हो अथवा पुरुष__ यह रहस्य भी मुझे व विशद रूप से कृपा करके बतलाओ

देवी जी ने कहा___ मैं और ब्रह्म एक ही है मुझ में और इन ब्रह्म में कभी किंचित मात्र भी भेद नहीं है| जो वे है, वही मैं हूं, और जो मैं हूं, वही वे है | बुद्धि के भ्रम से वेद प्रतीत हो रहा है हम लोगों की सूक्ष्म वेद को जो जानता है वही बुद्धिमान पुरुष है उसके संसार सागर से मुक्त होने में कुछ भी संदेह नहीं है ब्रह्म एक ही है ।


 देवी ने कहा__ शंकर मन को मुग्ध करने वाली यह महाकाली गौरी नाम से विख्यात है तुम इसे पत्नी रूप से स्वीकार करो कैलाश की रचना करके वहीं रहो और इसके साथ सुख शुखपुर्वक आनंद करो तुम्हारी लीला में तमोगुण की प्रधानता रहेगी सतोगुण रजोगुण गौण होकर रहेंगे रजोगुणी और तमोगुणी बनकर असुरों का संहार करने के लिए लीला आरम्भ कर दो "परम पुरुष का" ध्यान करने के लिए तुम तप कर चुके हो महादेव तुम बड़े पुण्यात्मा हो "परमात्मा शांति स्वरूप है" उनमें सतोगुण प्रधान हैं तुम्हें उनकी शरण लेनी चाहिए |

तुम तीनों तीन गुणों से संपन्न हो सृष्टि स्थिति और संहार तुम्हारे कार्य है संसार में कहीं भी कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो इन तीन गुणों से अतिरिक्त हो जगत में जितने पदार्थ दिख रहे हैं वह सब के सब त्रिगुणमय हैं | निर्गुण होकर सबको दिखाई दे ऐसी कोई वस्तु ना थी और ना होगी "निर्गुण तो परमात्मा है" जो कभी स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं होते | शंकर ! मैं समय अनुसार सगुण और निर्गुण भी रूप धारण कर लेती हूं मैं सदा कारण होकर रहती हूं | मैं सदा कारण होकर रहती हूं कभी कार्य की श्रेणी में नहीं गई | कारण होने की स्थिति में मेरा रूप सगुण रहता है | "परम पुरुष परमात्मा" के पास मैं निर्गुण रूप से रहती हूं |

 अतः मुझ कल्याणी को कारण कहते हैं | अहंकार मेरा कार्य है उसमें सत्व रज और तम तीनों गुण आ जाते हैं | अहंकार से महत्तत्त्व उत्पन्न होता है | यह समष्टि बुद्धि का परिचायक है | इससे महत्तत्त्व कार्य और अहंकार कारण कहलाता है अंक आरसी तन्मात्राएं उत्पन्न होती है __यह निरंतर का नियम है वे ही सूक्ष्म रूप से पंच भूतों की कारण होती है सबके सृजन में पंच भूतों के सात्विक अंश से पाँच कर्मेंद्रियां पाँच ज्ञानेंद्रियां पंचमहाभूत तथा 16 वा मन___ ये सभी उत्पन्न होते हैं | इनमें कोई कार्य होता है और कोई कारण इस प्रकार 16 विभिन्न पदार्थों का समुदाय यह "प्राणी" होता है | " परमात्मा आदिपुरुष है" वे न कार्य है और न कारण |शम्भो! सबके सृष्टि काल में इसी प्रकार की शैली बरती जाती है | यू सृष्टि का क्रम मैंने संक्षेप में तुम्हें बतला दिया अब मेरा कार्य सिद्ध करने के लिए विमान में बैठकर तुम लोग शीघ्र पधारो कोई कठिन कार्य उपस्थित होने पर जब तुम मुझे सिमरन करोगे तब मैं सामने आ जाऊंगी | देवताओं ! मेरा तथा "सनातन परमात्मा" का ध्यान तुम्हें सदा करते रहना चाहिए हम दोनों का स्मरण करते रहोगे तो तुम्हारे कार्य सिद्ध होने में किंचित मात्र भी सन्देह नहीं होगाभ | 

नारदजी के पूछने पर ब्रह्मा जी के द्वारा परमात्मा के स्थूल और सूक्ष्म स्वरूप का त्रिविध सृष्टि तथा गुणादि का वर्णन / अ. 7 

नारदजी __ पिताजी ! जो आद्य अविनाशी निर्गुण अक्षर एवं अव्यय परम पुरुष है , उनके देखे हुए और अनुभव किए हुए रूप का वर्णन करने की कृपा कीजिए, मैं त्रिगुणा शक्ति के दर्शन तो कर चुका |अब , निर्गुणा शक्ति कैसी है ? उनका रूप और परम पुरुष का रूप दोनों साथ ही मुझे बताइए | उनके दर्शन पाने के लिए श्वेत द्वीप में जाकर मैं महान तप करता रहा | बहुत से सिद्ध महात्मा और क्रोध पर विजय पाने वाले तपस्वी सामने आए | किंतु उन परब्रह्म परमात्मा को मैं नहीं देख सका | कृपा पूर्वक इनका परिचय मुझे बताइए |

ब्रम्हा जी बोले ___ मुने ! निर्गुण का रूप इन आंखों से नहीं देख सकता, क्योंकि निर्गुण में कोई रूप है ही नहीं, फिर वह दृष्टिगोचर कैसे हो | निर्गुणा सकती और निर्गुण परम पुरुष सुगमता पूर्वक नहीं दीख पड़ते | मुनि जन ज्ञान रूपी नेत्रों से उनका अनुभव करते हैं | इन दोनों प्रकृति और पुरुष को अजन्मा एवं अविनाशी समझना चाहिए | विश्वास पूर्वक चिंतन करने से इनकी झलक मिल सकती है | विश्वास की कमी हो तो ये कभी भी नहीं मिल सकते नारद संपूर्ण प्राणियों में जो चेतना है उसी को परमात्मा समझो तेजाः स्वरूप परमात्मा विभिन्न प्राणियों में व्यापक रूप से सदा विराजमान रहते हैं | नारद ! उन परमात्मा और आद्याशक्ति को व्यापक समझना चाहिए, वह सभी जगह रहते हैं, उनके बिना जगत में किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं है, वे दोनों विचिंत्य हैं वे सदा प्रत्येक प्राणी के शरीर में मिलकर रहते हैं, दोनों अविनाशी है एक रूप है, चिन्मय है, निर्गुण है, और मलशुन्य हैं, जो सक्ती है वही परमात्मा है और जो परमात्मा है वही सक्ती है, ऐसा सिद्धांत है, नारद इन में कोई भी भेद नहीं है यह सूक्ष्म तत्व समझ लो नारदजी! संपूर्ण शास्त्रों और अंगों उपांगोंसहित वेद का अध्ययन करने के पश्चात भी जिनके मन में वैराग्य का उदय नहीं होता वह पुरुष इन प्रकृति और पुरुष के सूक्ष्म भेद को नहीं जान सकता पुत्र तुम चरम कोटि के विद्वान हो | ➖भला, कोई सगुण प्राणी निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार कैसे कर सकता है ❓ अतः तुम्हें सगुण परमात्मा की ही अराधना करनी चाहिए |

नारदजी! ___ काम क्रोध लोभ मोह अहंकार तृष्णा द्वेष राग मद असूया ईष्या आदि सभी शरीर के विकार हैं, जब तक यह बाहर नहीं निकल जाती तब तक मनुष्य पुण्यात्मा नहीं बन सकता तीर्थ करने पर भी यदि यह विकार शरीर से बाहर ना निकले तो तीर्थ का फल केवल श्रम ही रहा | जैसे किसान कितने परिश्रम से खेती करता है विषम भूमि को सुडौल बनाकर उसमें अमूल्य बीज बीजता है मन में उत्तम आशा लगी रहती है दिन-रात खेती की रक्षा में अथक परिश्रम करता है और जब खेत में फल फूल लग रहे हैं इतने में ही रखवाली करने वाला किसान सो गया खेती को बाघ और मृग आदि जंगली जानवर सारा खेत खा गए बेचारा किसान निराश होकर बैठ गया | पुत्र! वैसे ही मन से विकार दूर न हुए तो,तिर्थाटन के परिश्रम से केवल दुख ही उठाना पड़ता है वह कोई फल नहीं दे सकता |

479____ गुणों का संयोग होने से इन ब्रह्मादि प्रधान देवताओं के मन में कभी प्रसन्नता होती है कभी उदासीनता छा जाती है और ये कभी विषादग्रस्त भी हो जाते हैं |तो इस जगत में रहने वाले अन्य साधारण व्यक्तियों के लिए कौन सी बात है देवता दानव मानव आदि सारा प्राणी जगत माया के अधीन हैं 

568__ अज्ञान का सर्वथा मीट जाना ही जीवन की सफलता है | मनुष्य का कर्तव्य है कि सारा प्रयत्न ज्ञान उपार्जन में लगा दे | संपूर्ण वैदिक कर्मों की चरम सीमा अंतःकरण की शुद्धि है | अतएव स्थूल देह से रहित ब्रह्म को नर कहते हैं |

562/श्रीदेवी बोली__ हिमालय! पहले केवल मैं ही थी दूसरी किसी वस्तु की सत्ता नहीं थी | उस समय मेरा रूप सत् चित् एवं आनंदमय परब्रह्म था अप्रतक्यर् , अनिर्देश्य,अनौपम्य,अनामय,हैं उसी रुप से कोई एक शक्ति स्वयं प्रकट हो गई उसका माया नाम पड़ गया उस उस शक्ति को निश्चित रूप से मेरी सर्जरी समझना चाहिए जिवों का जीना और मरना उसी शक्ति के कर्म है पढ़ाई के समय कुछ भी भेज नहीं रहा सब के सब उसी शक्ति में समा गए फिर अपनी उस शक्ति के सहयोग से मैं बीज रूप में परिणित हुई वह शक्ति उस समय मेरा आधार और आवरण थी इसलिए उसका कुछ दोष मुझ में भी आ गया | मेरा बीजाआत्मक रूप चैतन्य ब्रह्म के सहयोग से निमित तथा प्रपंच के परिणाम से समवायिकारण कहलाने लगा | कुछ लोग उस शक्ति को तब कहते हैं तथा दूसरे लोग तम एवं जड़ भी कहा करते हैं सेवर शास्त्र के तत्वदर्शी पुरुषों ने उस शक्ति के विषय में परस्पर परामर्श किया कि इसे ज्ञान माया प्रधान प्रकृति शक्ति अथवा आजा कह सकते हैं विधान के सिद्धांत का चिंतन करने वाले कुछ अन्य महापुरुषों ने कहा कि नहीं यह अविद्या का लाती है इस प्रकार वेदों में उसका विविध नामों से वर्णन किया गया उस शक्ति में जड़ता और ज्ञाननासकता स्पष्ट होने से उसका और असती नाम संगत हो गया |

564/ राजन ! उस समय जो प्रकृति नाम से विख्यात थी उसके भी दो भेद हैं माया और अविद्या शुद्ध सत्वप्रधाना माया है और मलिन गुण प्रधाना अविद्या जो अपने आश्रराय में आने वाले की रक्षा करती है उसे माया कहते हैं उस शुद्ध सत्वप्रधाना माया के साथ जो स्थित रहता है वही ईश्वर कहलाता है, उस ईश्वर को परब्रह्म की पूर्ण जानकारी रहती है वह सर्व ज्ञानी सबका उत्पादक तथा सब पर कृपा करने वाला है,और मलीन सत प्रधाना अयोध्या में जो प्रतिबिंब पड़ा उसे जीव कहते हैं

565/__ देवी ने कहा हिमालय मेरी माया शक्ति ने संपूर्ण चराचर जगत की रचना की है परमार्थ दृष्टि से विचार किया जाए तो वह माया भी मुझसे कोई भी वस्तु नहीं है व्यवहार की दृष्टि से वही यह विद्या एवं माया नाम से प्रसिद्ध है तत्व दृष्टि से पृथक कुछ नहीं तत्व केवल एक ही है वह तत्व मैं हूं| जो संपूर्ण जगत की सृष्टि करके फिर अपने असली स्वरूप तत्व में विलीन हो जाती हूं |

धरणीधर! ___ मुझ में ही यह संपूर्ण संसार होत प्रोत है कारण देह अभिमान ईश्वर मैं हूं लिंग देह अभिमानी विष्णु एवं स्थूल देह अभिमानी ब्रह्मा मैं हूं विष्णु रूद्र गौरी सरस्वती और लक्ष्मी मेरे रूप है मैं सूर्य चंद्रमा एवं नक्षत्र गुण हूं पशु पक्षी चांडाल तस्कर व्याध क्रूरकर्मी सत्कर्मी महाजन स्त्री पुरुष और नपुंसक यह सब कुछ मैं ही हूं |

566/___ हिमालय ने कहा देवी तुम अपने इस सर्वर अभिमानी विराट रूप का जैसा वर्णन करती हो वैसे ही रुको मैं देखना चाहता हूं मुझ पर कृपा हो तो दिखा दो

व्यासजी__ भगवती जगदंबा के ऐसे विराट रूप के उन श्रेष्ठ देवताओं ने दर्शन किए उनके शरीर से हजारों ज्वालायें निकल रही थी, हजार मस्तक हजार नेत्र और हजार चरणों से वह विराट विग्रह संपन्न था अत्यंत क्रूर आकृति थी देखते ही ह्रदय और नेत्र आतंकित हो जाते थे उस रूप को देखकर संपूर्ण देवता आकार मचाने लगे उनके हृदय कांप उठे उन्हें घोर मोर्चा आ गई स्मरण भी ना रहा कि यह भगवती जगदंबा है |


567/देवी ने __ भक्तवत्सल ता के कारण मैंने तुम्हें यह रूप दिखाया है केवल मेरी एक तरफा को छोड़कर वेद अध्ययन योगदान तब और यज्ञ कोई भी साधन इस रूप को दिखाने में कारण नहीं हो सकता |

देवी__ परमात्मा ही उपाधि वेद से जीव संज्ञा प्राप्त करता है फिर उसमें कर्तव्य गुण आ जाते हैं धर्म अधर्म हेतु का नाना प्रकार के कर्म करने की उसमें क्षमता आ जाती है जीव होने के कारण वह नाना योनियों में जन्म लेकर सुख-दुख भोक्ता है फिर तब तक संस्कार के प्रभाव से अनेकों प्रकार के कर्मों में उसकी प्रवृत्ति हो जाती है फल स्वरुप उसे भांति भांति के शरीर धारण करने पड़ते हैं सुख दुख से कभी छुटकारा नहीं मिलता घंटी नामक यंत्र की भांति इस जीव को कभी विश्राम करने का अवसर नहीं मिलता काम और क्रिया का क्रम निरंतर चालू रहता है इसमें कारण केवल अज्ञान ही है अतः अज्ञान का नाश करने के लिए मनुष्य को सदा प्रायत्न करना चाहिए | अज्ञान का सर्वथा मिट जाना ही जीवन की सफलता है पुरुषार्थ की समाप्ति तथा जीवनमुक्त दशा की उपलब्धि अज्ञान नाश पर ही निर्भर है इसी को श्रेष्ठ विद्या कहते हैं |

महामते!___ संपूर्ण वैदिक कर्मों की चरम सीमा अंतःकरण की शुद्धि है अतः उनको यातना पूर्वक करना चाहिए विक्रम है सन् दम तितिक्षा वैराग्य और सब तो असंभव अर्थात चित्त शुद्धि इतने ही कर्म करने योग्य हैं इसके बाद कुछ शेष नहीं रहता ।

देवी के द्वारा हिमालय को ज्ञान उपदेश ब्रह्म स्वरूप का वर्णन__ उस ब्रह्म का क्या स्वरूप है__ यह बतलाया जाता है जो प्रकाश स्वरूप सब के अत्यंत समीप में स्थित हिर्दय रूप गुहा में स्थित होने के कारण गुहाचर नाम से प्रसिद्ध और महान पद अर्थात परम प्राप्य है | जितने भी चेष्टा करने वाले श्वास लेने वाले आंखों को खोलने मुंह देने वाले प्राणी हैं सब उस ब्रह्म में ही समर्पित हैं उसी में स्थित है सत असत सब कुछ वही है , वही सब के द्वारा वर्णन करने योग्य सर्वोत्कृष्ट है व समस्त प्रजा के ज्ञान से परे है अर्थात किसी की बुद्धि में आने वाला नहीं है यह तुम जानो जो परम प्रकाश रूप है जो सूक्ष्म से भी अत्यंत सूक्ष्म है जिसमें संपूर्ण लोक और उन लोकों में निवास करने वाले प्राणी स्थित हैं, वही यह अक्षर ब्रह्म है वही सब के प्राण है वही सब की वाणी है और वही सबके मन है वह यह परम सत्य और अमृत अविनाशी तत्व है सौम्या ! वेधने योग्य लक्ष्य का तुम वेधन करो_ मन लगाकर उसमें तन्मय हो जाओ |

सौम्य!__ उपनिषद में कथित महान अस्त्र रूप धनुष लेकर उस पर उपासना द्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण संधान करो और फिर भावानुगत किसके द्वारा उस्मान को खींचकर उस अक्षर रूप ब्रह्म को ही लक्ष्य बनाकर वेधन करो 🕉 ओम धनुष है ! जीवात्मा बाढ़ है और ब्रह्म को उसका लक्ष्य कहा जाता है |

उस एकमात्र परमात्मा को ही जाने दूसरी सब बातों को छोड़ दें यही अमृत रूप परमात्मा के पास पहुंचाने वाला पुल है संसार समुद्र से पार होकर अमृत स्वरूप परमात्मा को प्राप्त कराने का यही सुलभ साधन है

इस आत्मा का ओम के जप के साथ ध्यान करो इससे अज्ञान में अंधकार से सर्वथा परी और संसार समुद्र से उस पार जो भ्रम है उसको पा जाओगे तुम्हारा कल्याण हो |

वह यह सब का आत्मा ब्रह्म ब्रह्म लोक रूप दिव्या आकाश में स्थित है |


जहां ऐसा ज्ञानी रहता है वही मेरे दर्शन हो सकते हैं मैंने तीर्थ में निवास करती हूं ना कैलाश में और ना बैकुंठ में ही मैं तो अपने ज्ञानी भक्तों के हृदय कमल में ही रहती हूं जो मेरे ज्ञान परायण वक्त की पूजा करता है वह मेरी पूजा से कोटि गुना अधिक फल पाता है जिसका चित्त स्वरूप ब्रह्म में लाए हो गया है उसका सारा कुल पवित्र हो गया उसकी जननी कृतकृत्य हो गई और पृथ्वी उसको धारण करके पुणे वती हो गई

576/__ जिसके द्वारा इस ब्रह्म विद्या का उपदेश होता है वह परमेश्वर ही है इस विद्या का बदला नहीं चुकाया जा सकता इसलिए गुरु के समीप शिष्य सदा ऋणी ही रहता है इस प्रकार ब्रह्म जन्मदाता ब्रह्म को प्राप्त करा देने वाला गुरु जन्मदाता माता पिता से भी अधिक पूज्य है क्योंकि पिता से प्राप्त जीवन तो नष्ट हो जाता है परंतु ब्रह्म रूप जन्म कभी नष्ट नहीं होता

 खाने नेता ब्रह्म दाता परम गुरु से कभी द्रोह ना करें ब्रह्म दातागुरु सबसे श्रेष्ठ है शिव के रुठ जाने पर गुरु बचा लेता है पर गुरु के रुठ जाने पर शिव नहीं बचा पाते ।

 देवी बोली__ मोक्ष प्राप्ति के साधन भूत मेरे तीन मार्ग परम प्रसिद्ध है कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग तीनों में यह भक्ति योग सम्यक प्रकार से संपन्न किया जा सकता है |

बनाना है मनुष्य के गुण भेद के अनुसार वह व्यक्ति भी तीन प्रकार की मानी जाती है जो दूसरों को दुखी बनाने के उद्देश्य से दमोह पूर्वक एवं क्रोध से भर कर भक्ति करता है उसकी वह भक्ति तामसी है जो दूसरों को पीड़ा तो नहीं देता परंतु अपना ही कल्याण चाहता है तथा जिसके हृदय कामनाओं से कभी खाली नहीं होता यस एवं भोग की लालसा लगी रहती है तथा जो फल पाने की इच्छा से ही श्रद्धा पूर्वक मेरी उपासना करता है उस मंदबुद्धि मानव द्वारा की हुई भक्ति राज्य सी है जो अपना कर्म परमात्मा को अर्पण कर देता है पाप को धो बढ़ाने के लिए ही कर्म करता है वेद की आज्ञा के अनुसार मुझे निरंतर चक्कर में लगे रहना चाहिए ह्यूमन में निश्चित करके भेज बुद्धि का आश्रय ले मेरी प्रसंता के लिए कर्म करता है उसकी वह भक्ति सात्विक की है पूर्वक राजस्व और तामस कर्म से मैं नहीं प्राप्त हो सकती |

👉 अब मैं श्रेष्ठ भक्ति का विवेचन करती हूं 

सभी जीव मेरे रूप हैं ऐसी धारणा सदा बनाए रखें अपने और पराए में एक समान प्रीति रखें चैतन्य परब्रह्मा समान रूप से सर्वत्र विराजमान है यह जानकर अभय दृष्टि रखी संपूर्ण रूपों में सर्वत्र सदा मुझे विराजमान समझकर प्रणाम एवं वजन करें

 चांडाल तक भी भगवती का रूप है ऐसी भावना होनी चाहिए भेद त्याग कर कहीं भी द्वेष भावना रखें |

पर्वतराज__ मैं जगत को उत्पन्न करने वाली परमेश्वरी हूं मैं संपूर्ण कारणों की मूल कारण हूं 

जिसमें देवी के अतिरिक्त किसी अन्य देवता का स्मरण तक ना हो वह पर भक्ति है

भक्ति की जो पराकाष्ठा है उसी को ज्ञान कहते हैं वैराग्य की भी चरम सीमा ज्ञान ही है क्योंकि ज्ञान प्राप्त हो जाने पर भक्ति और वैराग्य दोनों स्वयं सिद्ध हो जाते हैं

 ज्ञान मुक्ति का अचूक साधन है इसमें कोई संदेह नहीं है /568__ अनेक जन्मों के प्रयत्न से ज्ञान की उपलब्धि होती है अतः ज्ञान प्राप्त करने के लिए भली-भांति अपना करना चाहिए क्योंकि यह मनुष्य जन्म पुनः मिलना बड़ा कठिन है यदि किसी प्रकार मानव जन्म मिल भी गया तो ज्ञान उत्तम गुरु मिलना कठिन है जब अनेक जन्मों के पुण्य सहायक होते हैं तब पुरुष के मन में मुक्त होने की इच्छा उत्पन्न होती है जो मनुष्य इस प्रकार के सफल साधनों से संपन्न होने पर भी ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रयत्न नहीं करता उसका जन्म लेना व्यर्थ है दूध में छिपे हुए ग्रीस की भांति प्रत्येक प्राणी के हृदय में ज्ञान गुप्तरूप से छिपा है प्राणी को चाहिए कि ₹1 मदनी से निरंतर मत कर उसे प्राप्त कर ले ।


धर्म

 🙏धर्म कहता है_ यदि अधर्म का साथ कर्तव्य समझकर या विवश होकर भी दिया जाय तो भी वो अधर्म ही होता है और उसका साथ देने वाला भी दण्ड का अधिकारी होता है क्योंकि धर्म हर कर्तव्य से बड़ा और सर्वोपरि होता है धर्म

👉धर्म क्या है ? _ भगवान का सविधान ही धर्म है 

धर्म किसी एक या अधिक परलौकिक शक्ति में विश्वास और इसके साथ-साथ उसके साथ जुड़ी रीति, रिवाज, परम्परा, पूजा-पद्धति और दर्शन का समूह ही

और, ज्ञान, विवेक, सत्य, संतोष, प्रेम भाव, धीरज, निरदोषा( धोखा रहित), दया, क्षमा, शील, निष्कर्मा, त्याग, बैराग, शांति निजधर्मा, भक्ति कर निज जीव उबारे, समानता (मित्र सम सबको चित धारै इन गुणो का आचरण करना ही धर्म है सभी बुराइयों का त्याग करना ही धर्म है सत भक्ति करके आत्म कल्याण कराना ही धर्म है, मनुष्य का इनसानियत मानवता ही धर्म है, दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान

आज पुरे विश्व में अनेक प्रकार के धर्म को मानने वाले मानव है, लेकिन वे अपने आपको धार्मिक मानते हैं लेकिन उनके अंदर धार्मिक्ता नहीं होती हैं,धार्मिक्ता में बदले की भावना, ज्ञान का जवाब हिंसा से,अपने धर्म या अपने पूज्य के अपमान का उत्तर हिंसा से देना ये सब अधर्म है,अपने दुश्मन को भी छमा कर देना धर्म है,

 आज लोग धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह कर रहे हैं, कोई भी धर्म अपनी रक्षा के लिए हिंसा नहीं सिखाता, हर धर्म के प्रमुख लोग अपने अपने धर्म व इष्टदेव और धार्मिक क्रियाओं को सभी से सर्वश्रेष्ठ मानते व बताते हैं, अब आम जन साधारण किसको सहीं माने ना तो इन्हें सास्त्रों का ज्ञान ना भगवान का परिचय क्योंकि, संत गुरु ज्ञानी लोग एक दूसरे के ज्ञान का खंडन कर रहे हैं एक शास्त्र दूसरे शास्त्र को काट रहा है नानाप्रकार के शास्त्र है मत है अनुभव है गुरुओं, बाबाओं, ज्ञानीयों की कमी नही है कहाँ जायें किसको सहीं किसको गलत माने मानव जीवन अनमोल है गलत राह चले गये तो जीवन बर्बाद हो जायेंगा और लोगों के आस्था के साथ खिलवाड़ करके नकली धर्मगुरु हमें आपस में लड़वा रहें हैं,अरबो लोगों के जीवन बर्बाद करने से बेहतर कुछ नकली धर्मगुरु का जीवन दांव पर लग जाए, क्योंकि ऑल सृष्टि पर सिर्फ एक ही भगवान हो सकता है और सब का एक ही धर्म होना चाहिए और एक ही ज्ञान और एक ही गुरू और सब का एक ही भक्ति मार्ग होना चाहिए ताकि आपसी मतभेद ना रहे,और ऐसा ही है, लेकिन हम सब उस एक को पहचान नही पा रहे हैं,अब पहचान कैसे हो ? पहचान करने के सभी के अलग - अलग तरिके हो सकते है,मै अपनी कहता हूँ __ ज्ञानचर्चा में तो काबू नही आ रहे है लोग तर्क वितर्क करके निकल जाते हैं, हिरे की परख कैसे हो अगर भगवान सच्चाई की तरफ है तो सच्चाई का साथ जरूर देगा, एक कार्यक्रम रखा जाय और लाईव देखे दुनिया, दुनिया के सभी संतो धर्मप्रमुख गुरुओं को बुलाकर ये सर्त रखी जाय क्या ?


1⃣किसी मरणासन्न अवस्था रोगी को तुरन्त ठीक करे

2⃣मरे हुए व्यक्ति को जीवित करे

3⃣अपनी जान को खुद बचाय

इससे नकलीयों को सजा मिलेगा जो भी अपने आप को सर्वश्रेष्ठ बताते है सभी को आमन्त्रित किया जाय

और उनसे पुछा जाय क्या तुम सही भक्ति मार्ग बाता रहे हो अपने अनुयाईयो को क्या तुम भगवान से पुर्ण परिचित हो क्या तुम पुर्ण मोक्ष दे पाओगे अपने शिष्यो को ,क्या तुम सच्चा गुरु संत हो अगर हो तो तुम बांकी नकलीयों का बडे जोर सोर से विरोध क्यों नहीं करते क्योंकि सच्चा कोई एक ही हो सकता है ।।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

भुमिका

 🙏 🌺भूमिका🌺


अनादि काल से ही मानव परम शांति, सुख व अमृत्व की खोज में लगा हुआ है। वह अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रयत्न करता आ रहा है लेकिन उसकी यह चाहत कभी पूर्ण नहीं हो पा रही है एसा इसलिए है कि उसे इस चाहत को प्राप्त करने के मार्ग का पूर्ण ज्ञान नहीं हैं/ सभी प्राणी चाहते हैं कि कोई कार्य न करना पड़े, खाने को स्वादिष्ट भोजन मिले, पहनने को सुन्दर वस्त्र मिलें, रहने को आलीशान भवन हो, धूमने के लिए सुन्दर पार्क हो, मनोरंजन करने के लिए मधुर-२ संगीत हो, नाचै-गाए, खैले-कूदें, मौजमस्ती मनाए और कभी बीमार न हो, कभी बूढ़े न हो और कभी मृत्यु न होवे आदि २, परनु जिस संसार में हम रह रहे हैं यहां न तो एसा कहीं पर नजर आता है और न ही एला संभव है। क्योंकि यह लोक नाशवान है, इस लोक की हर वस्तु भी नाशवान है और इस लोक का राजा ब्रह्म काल है जो एक लाख मानव सूक्ष्म शरीर खाता है। उसने सब प्राणियों को कर्म-भर्म व पाप पुण्य रूपी जाल में उलझा कर तीन लोक के पिंजरे मैं कैद किए हुए है । कबीर साहब कहते हैं कि -कबीर, तीन लोक पिंजरा भया, पाप पुण्य दो जाल । सभी जीव भोजन भये. एक खाने वाला काल । । 


गरीब, एक पापी एक पुनि आया, एक है सूम दलेल रे । बिना भजन कोई काम नहीं आवै, सब है जम की जेल रे । । 


वह नहीं चाहता कि कोई प्राणी इस पिंजरे रूपी कैद से बाहर निकल जाए। वह यह भी नहीं चाहता कि जीव आत्मा को अपने नीज घर सतलोक का पता चलै । इसलिए वह अपनी त्रीगुणी माया से हर जीव को भ्रमित किए हुए है। फिर मानव को ये उपरोक्त चाहत कहां से उत्पन्न हुई हैं ? यहां एसा कुछ भी नहीं है। यहां हम सबने मरना हैं, सब दुखी व असान्त हैं/ जिस स्थिति को हम यहां प्राप्त करना चाहते हैं एसी स्थिति में हम अपने निज घर सतलोक में रहते थे/ काल ब्रह्म के लोक में स्वइच्छा से आकर फंस गए और अपन नीज घर का रास्ता भूल गए / कबीर साहब कहते हैं कि -


इच्छा रूपी खेलन आया, ताते सुख सागर नहीं पाया । 


इस काल ब्रह्म के लोक में शांति व सुख का नामोनिशान भी नहीं है। त्रिगुणी माया से उत्पन्न काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, लाभ हानि, मानबड़ाई रूपी अवगुण हर जीव को परेशान किए हुए हैं/ यहा" एक जीव दूसर जीव को मार कर खा जाता है, शोषण करता है, ईज्जत लूट लेता है, धन लूट लेता हैं, शांति छीन लेता है/ यहा' पर चारों तरफ आग लगी है/ यदि आप शांति से रहना चाहोगे तो दूसरे आपको नहीं रहने देंगे/ आपके न चाहते हुए भी चोर चोरी कर ले जाता है, डाकू डाका डाल ले जाता हैं, दुर्घटना घट जाती है, किसान की फसल खराब हो जाती है, व्यापारी का व्यापार ठप्प हो जाता है, राजा का राज छीन लिया जाता है, स्वस्थ शरीर में बीमारी लग जाती है अर्थात् यहा' पर कोई भी वस्तु सुरक्षित नहीं है / राजाओं के राज, इज्जतदार की इज्जत, धनवान का धन, ताकतवर की ताकत और यहां तक की हम सभी के शरीर भी अचानक छीन लिए जाते हैं/ मातापिता के सामने जवान बेटा-बेटी मर जाते हैं, दूध पीते बच्चों को रोते बिलखते छोड़ कर माता पिता मर जाते हैं, जवान बहनें विधवा हो जाती हैं और पहाड़ से दुखों को भोगने को मजबूर होते हैं/ विचार करें कि क्या यह स्थान रहने के लायक है ? लेकिन हम मजबूरी वश यहां रह रहे हैं क्योंकि इस काल के पिंजरे से बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता और हमें दूसरों को दुःखी करने की व दुख सहने की आदत सी बन गई/ यदि आप जी को इस लोक में होने वाले दुखों से बचाव करना है तो यहां के प्रभु काल से परम शक्ति युक्त परमेश्वर (परम अक्षर ब्रह्म) की शरण लेनी पड़ेगी। जिस परमेश्वर का खौंफ काल प्रभु को भी है/ जिस के डर से यह उपरोक्त कष्ट उस जीव को नहीं दे सकता जो पूर्ण परमात्मा अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म (सत्य पुरूष) की शरण पुर्ण संत के बताए मार्ग को ग्रहण करता है। वह जब तक संसार में भक्ति करता रहेगा, उसको उपरोक्त कष्ट आजीवन नहीं होते । जो व्यक्ति इस पुस्तक "ज्ञान गंगा" को पढ़ेगा उसको ज्ञान हो जाएगा कि हम अपने नीज घर को भूल गए हैं। वह परम शांति व सुख यहा' न होकर निज घर सतलोक में है जहां पर न जन्म है, न मृत्यु है, न बुढ़ापा, न दुख, न कोई लड़ाई-झगड़ा हैं, न कोई बिमारी हैं, न पैसे का कोई लेन-देन है, न मनोरंजन के साधन खरीदना है/ वहा पर सब परमात्मा द्वारा निःशुल्क व अखण्ड है/ बन्दी छोड़ गरीबदास जी महाराज की वाणी यें प्रमाण है कि :बीन ही मुख सारंग राग सुन. बीन ही तंती तार । बिना सुर अलगोजे बाजै, नगर नाच घुमार । । घंटा बाजै ताल नग, मंजीरे डफ झांझ । मुरली मधुर सुहावनी. निसवार और सांझ । । बीन विहंगम बाजहिं, तरक तम्यूरे तीर । राग खण्ड नहीं होते है, बंध्या रहत समीर । । तरक नहीं तोरा नही. नाही कशीस कबाब । अमृत प्याले मध पीवै. ज्यो भाटी चबै शराबा । मतवाले मस्तानपुर, गली…२ गुलजार । संख शराबी फिरत है, चली तास बजार । । संख-संख पत्नी नाचै, गावै शब्द सुभान । चद्र बदन सूरजमुखी, नाही मान गुमान । । संख हिंडोले नूर नग, झूले सत हजूर । तख्त धनी के पास कर, ऐसा मुलक जहूर । । नदी नाव नाले बगै, छुटै फुहारे सुन्न । भरे हौद सरवर सदा, नहीं पाप नहीं पुण्य । । ना कोई भिक्षुक दान दे, ना कोई हार व्यवहार । ना कोई जन्मे मरे. ऐसा देश हमार । । जहा संखो। लहर मेहर की उपजै, कहर जहा नहीं कोई । दासगरीब अचल अविनाशी, सुख का सागर सोई । । 


सतलोक में केवल एक रस परम शांति व सुख है/ जब तक हम सतलोक में नहीं जायेंगे तब तक हम परमशांति, सुख व अमृत्व को प्राप्त नहीं कर सकते/ सतलोक में जाना तभी संभव है जब हम पुर्ण संत से उपदेश लेकर पूर्ण परमात्मा की आजीवन भक्ति करते रहें। इस पुस्तक "ज्ञान गंगा" के माध्यम से जो हम संदेश देना चाहते हैं उसमें किसी देवी देवता व धर्म की बुराई न करके सर्व पवित्र धर्म ग्रंथों में छुपे गुढ रहस्य को उजागर करके यथार्थ भक्ति मार्ग बताना चाहा है जो कि वर्तमान के सर्व संत, महंत व आचार्य गुरु साहेबान शास्त्रों में छिपे गूढ रहस्य को समझ नहीं पाए/ परम पूज्य कबीर साहेब अपनी बाणी में कहते हैं की 'वेद कतेब झूठे ना भाई, झूठे हैं सो समझे नाही । 


जिस कारण भक्त समाज को अपार हानि हो रही है/ सब अपने अनुमान से व झुठे गुरुओं द्वारा बताई गई शास्त्र विरुद्ध साधना करते हैं। जिससे न मानसिक शांति मिलती है और न ही शारीरिक सुख, न ही घर व काररेबार में लाभ होता है और न ही परमेश्वर का साक्षात्कार होता है और न ही मोक्ष प्राप्ति होती है/ यह सब कुछ कैसे मिले तथा यह जानने के लिए कि मैं कौन हूँ, कहां से आया हूँ, क्यों जन्म लेता हूँ, क्यों मरता हूँ और क्यों दुख भोगता हूँ ? आखिर यह सब कौन करवा रहा हैं और परमेश्वर कौन है, कैसा है, कहां है तथा कैसे मिलेगा और ब्रह्मा, विष्णु और शिव के माता पिता कौन हैं और किस प्रकार से काल ब्रह्म की जेल से छुटकारा पाकर अपने नीज घर सतलोक में वापिस जा सकते हैं यह सब इस पुस्तक के माध्यम से दर्शाया गया है ताकि इसे पढ़कर आम भक्त आत्मा का कल्याण संभव हो सके यह पुस्तक सतगुरु रामपाल जी महाराज के प्रवचनों का संग्रह है। जोकि सदग्रंथों में लिखे तथ्यों पर आधारित है हमें पूर्ण विश्वास है कि जो पाठक जन रुचि हुआ निष्पक्ष भाव से पढ़कर अनुसरण करेगा उसका कल्याण संभव है।

:- आतम प्राण उद्धार ही ऐसा धर्म नहीं और कोटी अश्वमेघ यज्ञ सकल समाना भौर जीव उद्धार परम पुण्य ऐसा कर्म नहीं और मरुस्थल के मृग ज्यों, सब मर गए दौड़ दौड़ ।।

भावार्थ‍‌‌‍‍ _ यदि एक आत्मा को सत भक्ति मार्ग पर लगाकर उसका आत्म कल्याण करवा दिया जाए तो करोड़ अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है और उसके बराबर कोई भी धर्म नहीं है जीवात्मा के उद्धार के लिए किए गए कार्य अर्थात सेवा से श्रेष्ठ कोई भी कार्य नहीं है अपने पेट भरने के लिए तो पशु-पक्षी भी सारा दिन भ्रमते हैं उसी तरह वह व्यक्ति है जो परमार्थी कार्य नहीं करता परमार्थी कर्म सर्वश्रेष्ठ सेवा जीव कल्याण के लिए किया कर्म है जीव कल्याण का कार्य ना करके सर्व मानव मरुस्थल के हिरण की तरह दौड़ दौड़ कर मर जाते हैं जिसे कुछ दूरी पर जल ही जल दिखाई देता है और वह दौड़ कर जाने पर थल ही प्राप्त होता है फिर कुछ दूरी पर थल का जल दिखाई देता है अंत में उस हिरण की प्यास से ही मृत्यु हो जाती है ठीक इसी प्रकार जो प्राणी इस लोक में जहां हम रह रहे हैं वे उस हिरण के समान सुख की आशा करते हैं जैसे निसंतान सोचता है संतान होने पर सुखी हो जाऊंगा संतान वालों से पूछे तो उनकी अनेकों समस्याएं सुनने को मिलेगी निर्धन व्यक्ति सोचता है कि धन हो जाए तो मैं सुखी हो जाऊं जब धनवानो की कुशल जानने के लिए प्रश्न करोगे तो ढेर सारी परेशानियां सुनने को मिलेगी कोई राज्य प्राप्ति से सुख मानता है यह उसकी महा भूल है राजा मंत्री मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री राष्ट्रपति को स्वप्न में भी सुख नहीं होता जैसे चार पांच सदस्यों के परिवार का मुखिया अपने परिवार के प्रबंधन में कितना परेशान रहता है राजा तो एक क्षेत्र का मुखिया होता है उसके प्रबंधन में सुख स्वप्न में भी नहीं होता राजा लोग शराब पीकर कुछ गम भुलाते हैं माया इकट्ठे करने के लिए जनता से कर लेते हैं फिर अगले जन्मों में जो राजा सत भक्ति नहीं करते पशु योनियों को प्राप्त होकर प्रत्येक व्यक्ति से वसूले करके उनके पशु बनकर लौटाते हैं जो व्यक्ति मन मुखी होकर तथा झूठे गुरुओं से दीक्षित होकर भक्ति तथा धर्म करते हैं वह सोचते हैं कि भक्ति में सुख होगा लेकिन इसके विपरीत दुख ही प्राप्त होता है  कबीर साहेब  कहते हैं कि मेरा यह ज्ञान ऐसा है कि यदि ज्ञानी पुरुष होगा तो इसे सुनकर ह्रदय में बसा लेगा और यदि मूर्ख होगा तो उसकी समाज से बाहर है 

कबीर ज्ञानी सुने तो हृदय लगाई मूर्ख सुने तो गम ना पाए

नियम

 🙏🔥गुरु दीक्षा लेने से पहले आवश्यक नियम जिनका आपने अतिम स्वास तक पालन करना हैं🙏

 1.  हुक्का शराब , मांस , तम्बाकू , बीयर, सिगरेट, हुलांस सुंघना , अण्डा , सुल्फा , अफीम, गांजा और अन्य नशीली वस्तुओं का सेवन तो दूर रहा किसी को नशीली वस्तु ला कर भी नहीं देनी हैं । क्योंकि बुराई करना व उसमें सहयोग देना दोनो ही महापाप हैं और भक्ति मार्ग भे विष के समान है।

2.  किसी प्रकार का कोई व्रत , तीर्थ , गंगा स्नान आदि नहीं करना तथा किसी अन्य धार्मिक स्थल पर स्नानार्थ , या दर्शनार्थ नहीं जाना है। किसी मन्दिर में पूजा व भक्ति के भाव से नहीं जाना कि इस मन्दिर में भगवान है । भगवान कोई पशु तो नहीं की उसको पुजारी जी ने मन्दिर में बांध रखा हैं। भगवान तो कण-कण में व्यापक है। उसके गुणों का लाभ लेने के लिए प्रथम गुरू बनाइए । नाम लेकर सुमिरण करो । तब आपको ईश्वरीय लाभ प्राप्त होगा । कबीर साहेब कहते हैं :कबीर पर्वत-पर्वत मैं फिरा , कारण अपने राम । राम सरीखे जन मिले , जिन सारे सब काम ।। 


3.  यदि किसी की मौत हो जाती हैं तो उसके फूल आदि कुछ नहीं उठाने हैं, ना पिण्ड भरवाने हैं, ना तेराहमी , छ:माही , बरसोदी, पित्र-पुजा , कोई भी समाधि पूजना , श्राद्ध निकालना आदि कुछ नहीं करना हैं । यह पांच तत्व से बना शरीर तो एक वस्त्र की तरह हैं । मूल वस्तु जीवात्मा है। वह कर्म आधार पर नए शरीर में जा चुकी होती हैं । हम अज्ञानियों द्वारा भ्रमित होकर पीछे क्रियाएँ कारते रहते हैं,जो व्यर्थ है । गरीबदास जी महाराज कहते हैैं,

 देह पड़ी तो क्या हुआ, झूठी सभी पटीटा।पक्षी उड़ा आकाश कूं, चलता कर गया बीट।


4. अन्य किसी देवी-देवता की पुजा नहीं करनी हैं कबीर साहेब कहते हैं … माई मसानी सेढ़ शीतला भैरव भूत हनुमत । पत्मात्मा उनसे दूर है, जो इनको पुजंत ।। 


।। कबीर, देवी-'देव ठाढे़ भये , हमको ठौर बताओ । जो मुझ (कबीर) को पुजें नहीं , उनको लूटो खाओ । 


कबीर , सौ वर्ष सतगुरू पूजा , एक दिन आन उपासी। वो अपराधी आत्मा पड़े काल की फांसी । 


5. ऐसे व्यक्ति का झूठा नहीं खाना , जो नशीले पदार्थों का सेवन करता हो।

6. जुआ,ताश कभी नहीं खेलना हैं।

7. किसी प्रकार के खुशी के अवसर पर नाचना व अश्लील गाने गाना सख्त मना हैं।

8. अपने गुरू देव जी की आज्ञा के बिना घर में किसी प्रकार का यज्ञ हवन, धार्मिक अनुष्ठान नहीं करवाना है बन्दीछोड़ अपनी वाणी मे कहते हैं 

: - गुरू बिन यज्ञ हवन जो करही मिथ्या जाय कबहु नहीं फलहीं। गुरू बीन होम यज्ञ जो साधै, ओरो दस मन पातक लागे।।

9. छुआछात नहीं करना हैं। हम सब एक मालिक के बन्दे हैं। भगवान ने किसी भी जाति या मजहब (धर्म) के स्त्री पुरूषों में कोई अन्तर नहीं किया तो हम क्यों करें ? 

10 . दहेज लेना व देना कुरीति हैं तथा मानव मात्र की अशांति का कारण है। उपदेशी के लिए मना है। जिसने अपने कलेजे की कौर पुत्री को दे दिया फिर बाकीं क्या रहा ? "आपसे आवै रत्न बराबर,  मांगा आवै लोहा "


11. वास्तुकला या ज्योतिष आदि के चक्र में नहीं पड़ना है प्रभु पर विश्वास रखें । 

👉उपरोक्त नियमों में से किसी भी नियम का उल्लंघन कर दिया तो आप नाम रहित हो जाओगे । 🙏🙏

मर्यादा

 🙏उपदेश प्राप्त पुश्यात्माएँ परमात्मा कें मार्ग पा चलतीं हैं । वह परमात्मा प्राप्ति के लिए यात्रा प्रारंभ करती है । यात्री बहुत ही कम सामान लेकर यात्रा करता है । अधिक भार उठा कर यात्रा करना संभव नहीं होता । जो सांसारिक परम्पराऐ हैं, वे व्यर्थ का भार है जो भक्तिमार्ग में यात्रा करने में बाधक हैं ! इसलिए इस भार से मुक्त होने के लिए निम्न नियमों का पालन करना अनिवार्य है . 


१. किसी के पैर नहीं छूने हैं और ना ही दूसरे को छूने देना है यदि अचानक या मना करने पर भी पैर छू लेता है तो उस स्थिति में नाम खण्ड नहीं होता । आप ने किसी को बद्दुआ या आशीर्वाद नहीं देना है, न ही इच्छा करक किसी से आशीर्वाद लेना है कोई आप के सिर पर आशीर्वाद के लिए हाथ रखे तो आपने मना करना है, फिर भी कोई हाथ रख देता है तो आप का उपदेश सुरक्षित है परन्तु आप ने आशीर्वाद व बदृदुआ बिल्कुल नहीं देनी है । क्योंकि आशीर्वाद देने से आप की भक्ति कमाई जाती है । जैसे एक पहिए की ट्रयूब से दूसरे पहिए की ट्यूब में हवा डालने से आप की गाडी खडी हो जाएगी । आप को हानि हो जाएगी । एक उपदेशी बहन ने अपने अनुपदेशी भाई को स्वस्थ होने का आशीर्वाद दे दिया भाई तो स्वस्थ हो गया परन्तु बहन इतनी ,अस्वस्थ हुई की एक "महिना अस्पताल में रही । पुन: उपदेश लिया अपनी गलती की क्षमा याचना करने पर वह स्वस्थ हो पाई । इसलिए सर्व से प्रार्थना है कि यह गलति न करें। इसी प्रकार अन्य नियमों के खण्ड करने से ' आपकी राम नाम की गाडी में पंचर हो जाएगा वह भी रूक "जाएगी अर्थात् आप जी को हानि होगी । पूर्व समय में सतिप्रथा (परम्परा) थी । जिस किसी का पति मर'जाता था तो उसकी स्त्री को भी मृत पति के साथ जिंदा जलाया जाता था जो एक महा जालिम कर्म था उस समय के मानव समाज ने उस कुरीती को मजबूरन मानना पडता था । किसी महापुरूष ने संघर्ष करके उस सतिप्रथा को बन्द कराया । समाज के रूढीवादी व्यक्तियों ने बहुत विरोध भी किया, परन्तु प्रयत्न सफल हुआ तो आज सर्व बहनें सुखी हैं । इसी प्रकार ये सर्व परम्पराएँ जानों जो मानव समाज पर भार हैं । इनको समाप्त करने से ही भार मुक्त हो सकेंगे तथा भक्ति मार्ग पर आसानी से चल सकेंगे ।


2. टी. वी., कम्यूटर तथा मोबाइल में फिल्म, सीरियल, मैच, कार्टून देखना तथा मोबाइल में विडियो गेम आदि नहीं खेलना है । 


3. किसी को दान (बीना सिला कपड़ा, सीधा आदि) नहीं देना हैं, न ही किसी धार्मिक स्थल (मन्दिर, मैण्डी) के लिए पैसे देने हैं और न ही उनक किसी भंडारे में जाना है। जैसेधर्मशाला, गली पवकी करने, कुआं तथा तालाब (जोहड़) की खुदाई, खेतों के साझले नाले की खुदाई तथा अन्य इसी प्रकार के सामूहिक सामाजिक कार्यो के लिए पैसे दे सकते हैं ।


4. माथे पर तिलक न लगाना है और न ही लगवाना है, भात में पटड़े पर नहीं चढ़ना है, गले में माला नहीं डलवानी है और न ही डालनी है और नही किसी की झोली में पैसे डालने या लेने हैं । यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो  विवाह केवल असुर निकन्दन रमैणी करके साधारण विधि से करना है तथा भात परम्परा को समाप्त करना है 


5. कोई त्यौहार, जागरण, मुण्डन, धार्मिक अनुष्ठान जन्मदिन, छटी आदि नही मनाना है, न ही उसमें जाना व सहयोग करना है । , 


6. किसी को दुआ या बदृदुआ नहीं देनी है ।


7. किसी को Good morning, Good afternoon, Good evening, Good night,  आदि शब्द नहीं बोलने हैं यदि कोई बोलता है तो उसे समय अनुसार केवल Morning Morning Evening  Evening Afternoon व Night  Night दो-दो बार बोल दें


8. Happy Birthday, Happy New year, तथा Good bye, आदि शब्द नहीं बोलने हैं यदि कोई आपसे बोलता है तो उसे धन्यवाद या Thank you बोल दे


9. सिक्खों को छोड़कर संत-बाबा रूप में दाढी न हो।


10. बहनों ने नेल पालिस ओर लिपिस्टिक नही लगानी हैं ।


11. परफ्यूम तथा सेंट आदि नहीं लगाना है ।


12. विवाहित बहनें केवल सिन्दूर या बिन्दी में से एक चीज लगा सकती हैं ।


13. किसी अनउपदेशी का झूठा नहीं खाना है यदि अनजान में खाया है तो क्षमा होता हैं । भविष्य में ध्यान रखें ।


14. हाथों पर मेंहदी नहीं लगानी है । किसी बिमारी के कारण लगा सकते है, सिर में लगा सकते हैं । हाथों में मेहंदी लगाने से नाम खण्ड होता है ।


15. शादी में जाते है तो पैसे (शगुन' वारफेरी, मुंह दिखाई पर पैसे) नहीं देने है । विदाई के समय घर में नारियल नहीं फोड़ना है, कन्याविदाई के समय गाडी पर पानी डालना या धवका लगाना आदि सगुन करना मना है ।


16. किसी को किसी भी अवसर पर Gift देना मना है 1 अगर कोई 6111दे तो कोशिश करनी है ना लो 1 अगर कोई पीछे से रख जाऐ या डाक या कोरियर द्वारा भेजे तो उसको रख लें उनके उपलक्ष में कुछ रूपये दान आश्रम में कर दें ।


17. परिवार में किसी की भी शादी हो तो परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कपड़े आदि नहीं देने व नहीं लेने हैं । 


18. कन्या दान रूप में कपड़े, गहने आदि नहीं देने हैं। रूपये भी इस उपलक्ष में देने हैं कि आप ने वहां खाना खाया है । और बहन के घर जाते है तो इसी उद्देश्य से पैसे दे सकते हैं कि आपने वहां खाना खाया है या चाय आदि पी है यदि अधिक धन दे दिया तो आप की बहन पर आप का ऋण न हो जाए तथा संस्कार न जुड जाऐं । क्योंकि हम संस्कार वश ही यहां काल जाल में रह जाते हैं । यदि आप पैसा देना चाहें और बहन न लेवे तो दोनों ही भार मुक्त हो जाते हैं । यदि बहन-बुआ जी आदि उपदेशी हैं तो उन को चाहिए कि वह पैसा रूपया-कपड़ा आभूषण कदापि न लें । प्यार से कहें कि आपने कह दिया, हमने मान लिया, ऐसे शिष्टाचार से मना कर दें । 


19. स्कूल में गायत्री मन्त्र बोलते समय ओं३म् शब्द नहीं बोलना है । क्योंकि जिसे गायत्री मंत्र कहते है यह यजुर्वेद कं अध्याय 36 का मंत्र 3 है । मूल पाठ में ओ३म् मन्त्र नहीं है । वेद परमात्मा की अनूठी देन है इसमें वृद्धि या कटौती करना, परमात्मा का अपमान है, लाभ के स्थान पर हानि ही होती है, इस लिए इस मन्त्र के साथ ओउम् नहीं बोलना है । यजुर्वेद के अ. 36 मंत्र 3 अर्थात् कथित "गायत्री मंत्र” मात्र परमात्मा की महिमा का एक मंत्र है । इसे पढने से परमात्मा के गुणों का ज्ञान होता है । जैसे बिजली की महिमा कहीं लिखी हो उसको कविता बनाकर गाते रहने से बिजली के गुणों का ज्ञान है परन्तु बिजली का लाभ नहीं मिल सकता  लाभ तो बिजली का कनेक्शन लेने से ही मिलेगा  इसी प्रकार यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 जिसको गायत्री मंत्र बताकर जाप करने को कहते हैं  वह व्यर्थ है । क्योंकि यह मंत्र तो परमात्मा की महिमा का ज्ञान कराता है । परमेश्वर के गुणों अर्थात् लाभ को बताता है । वह लाभ अधिकारी संत से सत्यनाम व सारनाम की दीक्षा प्राप्त करके अर्थात् कनेक्शन लेकर ही प्राप्त हो सकते हैैं यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 अर्थात् गायत्री मंत्र की आवृर्ति करने से नहीं  फिर भी कोई अज्ञानी व्यक्ति विद्यार्थियों को विवश ' करे तो 🕉️ शब्द का उच्चारण न करें केवल गायत्री मंत्र का भुर्भव: स्व: से ही उच्चारण प्रारम्भ करें । "ओ३म" एक  अक्षर को न लगाएँ अध्यापकों को चाहिए कि यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 की अपेक्षा सन्त गरीबदास जी महाराज की वाणी से मंगलाचरण विद्यार्थीयों से बुलाए' । गायत्री मंत्र से कई गुणा लाभ होता है परन्तु सत्यनाम बिना सब व्यर्थ है ।

 20. किसी मुर्दे के अंतिम संस्कार में लकड़ी डाल सकते हैं ! कंधे पर या'अन्य साधन द्वारा शव को ले जा सकते हैं !

 21. मुर्दे पर एक से अधिक कफन नहीं डालना है यदि आप से पहले किसी ने कफन डाल रखा हैं तो आप ने कफन नहीं डालना हैं क्योंकि कफन केवल एक ही होता है अगर पहले कफन डाल रखा है फिर किसी ने एक से ज्यादा कफन डाला है तो नाम खण्ड होता है ! 


22. शादी में खाना खा सकते है, लड़के या लड़की की शादी में खाना खाकर आते हैं यह मान कर पैसे दे सकते हैं कि आपने वाहां भोजन खाया हैं ।


23. यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो पीलिया देना, छुछक देना बन्द करना है । एक पक्ष अनुपदेशी है तो केवल एक २ जोडी कपड़े केवल जच्चा व बच्चे के देने हैं ।


24. नौकरी पर आॅफिस में जब कोई रिटायर होता है तो आॅफिस में सभी आपस में पैसे इकठ्ठे करके उसे Gift तथा पार्टी देते हैं ऐसा कर सकते हैं । (इसमें थोडा बहुत दे सकते हैं) लेकिन उपदेशी ने कतई नहीं लेना है । 


25. घर में जब बहन आती है तो उसे कपड़े व पैसे नहीं देने हैं । अगर बहन या बेटी अनुपदेशी है तो बहुत कम एक २ जोडी कपडे दे सकते है । बच्चों के लिए खाने पीने का सामान दे सकते हैं और अगर जब बहन के घर जाते हैं तो साथ में बच्चों के लिए फल, मिठाई आदि ले जा सकते हैं । 


26. स्कूल में विदाई पार्टी के समय बच्चे पैसे दे सकते हैं ।

 27. गौशाला में पैसा नहीं, चारा आदि दे सकते हैं । 


28. शादी की मिठाई कोई घर में लेकर आए तो और कुछ शादी के नाम के कार्ड के साथ मिठाई लाते हैं तो हृदय से मना करें । फिर भी कोई रख जाए तो खा सकते हैं उस के बदले में कुछ रूपये आश्रम में दान कर दें । आप पर भार नहीं रहेगा। अगर उपदेशी परिवार शादी में मिटाई बनाए तो वो आई हुई रिश्तेदारी या बहन को मिठाई बांधकर दे सकते है, परन्तु यह मिठाई बनाने की परम्परा ही गलत है सामान्य भोजन बनाऐं जैसे अतिथि का सत्कार करने के लिए बनाते हैं खीर, खाण्ड हल्वा बना सकते हैं । 


29. भगत भाई आपस में उधार सामान एक दूसरे से ले सकते हैं और अगर आपस में एक दूसरे के घर आते जाते हैं तो बच्चों के लिए खाने पीने का सामान ले जा सकते हैं । 


30. भाई या बहन की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो आर्थिक या अन्य मदद उधार रूप में कर सकते हैं । बहन को चाहिए कि उस पैसे को लौटाए जिस से उस पर भार नहीं बनेगा । यदि बहन धन लौटाने में असमर्थ है तो' भाई कभी बहन पर पैसे लौटाने का दबाब न बनाए । 


31. लड़की की शादी में माता पिता अपनी लड़की को एक दो जोड़ी कपड़े दे सकते हैं पैसे नहीं, अगर लड़के की शादी में लड़की वाले बगैर नाम वाले है और वो अगर जबरदस्ती अपनी लड़की को कुछ देना चाहे तो इसी प्रकार लड़की की शादी में लड़के वाले अनउपदेशी कुछ मांग करे तो स्पष्ट मना कर दें बिल्कुल नहीं लेना देना हैं । 


32. जिन लडकियों का विवाह होता है वे जिन कपड़ो को पहन कर विवाह मण्डप अर्थात रमैणी में बैठे उन्हीं कपड़ों में अपनी ससुराल जाऐं । अन्य पोशाक न बदले किन्हीं परिस्थितियों में बदलनी पडें (जैसे मिट्टी लग जाए' गीली हो जाए या अन्य कारण से खराब हो जाए) तो बदल सकतें हैं । अन्यथा नहीं । देखने में आया है कि कुछ बहनें रमैणी में विवाह के समय सामान्य पोषाक पहनती है‘ बाद ने तड़क भड़क वाली पोषाक पहन कर ससुराल जाती है' 

वह मर्यादा के विरूद्ध है । विवाह के समय जैसी भी नई या' पुरानी पोषाक पहन रखी है, उसी को पहन कर ससुराल जाऐ, अन्य या उपरोक्त परिस्थितियों मे' पोषाक बदली जा सकती है । 


33 आपके द्वार पर कोई भिक्षुक आता या कहीं बाजार में आप से कोई भिक्षा माँगता है तो उसे पैसे न दें खाना खिला दें । यदि उसको वस्त्र की आवश्यकता है तो वस्त्र बिना सिला न दें, पुराना या नया सिला हुआ कपड़ा दें ' कम्बल या चादर भी पुराना दें नहीं तो अधिकतर भिक्षुक शराबी कवाबी हैं, नए कपडों को बेचकर शराब आदि नशीली वस्तुओं का प्रयोग करते हैं वह दोष दान करने वाले को भी लगेगा । एक श्रद्धालु ने कहा कि यह अच्छा सा नहीं लगता कि भिक्षुक को रूपये न दें, आत्मा नहीं मानती? उस के लिए उत्तर तथा एक उदाहरण यह है कि एक भद्रपुरूष ने एक भिखारी को 1०० रूपयों की भिक्षा दे दी । पहले वह भिक्षुक पाव शराब पीता था अपनी पत्नी व परिवार को परेशान करता था । उस दिन 100  रूपये प्राप्त होने के कारण उस भिखारी ने आधा बोतल शराब पी ली । शराब के नशे में अपनी पत्नी को पीट डाला । उस भिखारी की पत्नी ने बच्चों समेत आत्महत्या कर लीं । उस जैनटलमैन के सौ रूपये के दान ने एक परिवार को उजाड दिया । इसका दोष दानकर्ता को है । गीता में लिखा है कि कुपात्र को किया दान लाभ के स्थान पर हानि करता है । कबीर परमेश्वर जी कहतें हैं : 


गुरु बिन माला फेरते गुरु बिन देते दान । गुरु बिन दोनों निस्फल हैं, पूछो वेद पुरान । । 


34. किसी भी नियम के खण्डित हो जाने पर आप को परमेश्वर से मिलने वाला लाभ बन्द हो जाएगा। जैसे बिजली का कनैक्शन कट जाने पर सर्व लाभ बन्द हो जाते हैं । जो कार्य बिजली से होने थे वे रूक जाते हैं । इसी प्रकार परमात्मा की शक्ति से जो आपको तथा आपके परिवार को लाभ मिलना था वह रूक जाता है । एक बहन ने बताया कि उसके पति ने दीक्षा भी ले रखी है किसी भी नियम का पालन नहीं करता । इसी प्रकार एक भक्त ने अपनी पत्नी की शिकायत की । उसके विषय में यह जाने कि उनका नाम खण्डित हो चुका है ऐसे व्यक्तियों का कोई भयंकर पाप कर्म है । नाम खपिडत होने पर वह पापकर्म अपना प्रभाव करके हानि करेगा जब तक मर्यादा में रहकर भक्ति करते हैं तो वह पाप कर्म हानि नहीं कर सकता । 


एक बहन ने ऐसे ही नाम खपिडत कर रखा था कुछ वर्षों के पस्चात् उसकी जीभ में केंसर का रोग हो गया उस  बहन से पूछा कि क्या अब आपको टीवी. देखना, लिपिस्टीक लगाना अच्छा लगता है? उसने रोते हुए कहा नहीं-नहीं । 


इसी प्रकार परिवार व शरीर में हानी से बचने के लिए तथा परमात्मा से लाभ प्राप्त करके मोक्ष प्राप्ति के लिए मर्यादा में रहे अन्यथा पाप कर्म आपको क्षति कर देगा । 


इसलिए सर्व मुपयात्माओं से पुनः निवेदन है कि सर्व नियमों का विधीवत् पालन करके मानव जीवन को सफल बनाये तथा पूर्ण मोक्ष प्राप्त करके सदा सुखी बने, सतलोक में निवास करें । 


जो विद्यार्थी शिक्षा समय में मौज मरती करते हैं वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं आजीवन कष्ट उठाते हैं । जो शिक्षा के समय मे मौज मस्ती न करके लगन से शिक्षा पूरी कर जाते है तो उनको विद्यालय में किये प्रयत्न का फल बाहर क्षेत्र में नौकरी द्वारा प्राप्त होता है । इसी प्रकार सर्व मानव परमात्मा प्राप्ति के विद्यालय में विद्यार्थी (भक्त) हैं । जो भक्त मौज मस्ती करते हैं । भक्ति तथा नियमों का पालन न करके अन्य प्राणियों के शरीरों में घोर कष्ट उठायेंगे । जो लगन के साथ मर्यादा में रहकर परमेश्वर कबीर जी की भक्ति साधना जगत गुरु संत रामपाल जी महाराज से प्राप्त करके आजीवन करते रहेंगे उनको सत्यलोक में सर्व सुविधाएँ प्राप्त होगी वहाँ वृद्ध अवस्था नहीं है मृत्यु भी नहीं होती ऐसा ही जीवन है, नर-नारी व परिवार है वह कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता । इसलिए सत्य भक्ति करके अपना जीवन सफल बनायें । जिस सत्य भक्ती से आपको यहां भी सर्व आवश्यक सुख सुविधायें प्राप्त होंगी तथा पूर्ण मोक्ष भी 


मिलेगा। 🙏🙏


शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

भारती मर्यादा


 उपदेश प्राप्त पुश्यात्माएँ परमात्मा कें मार्ग पा चलतीं हैं । वह परमात्मा प्राप्ति के लिए यात्रा प्रारंभ करती है । यात्री बहुत ही कम सामान लेकर यात्रा करता है । अधिक भार उठा कर यात्रा करना संभव नहीं होता । जो सांसारिक परम्पराऐ हैं, वे व्यर्थ का भार है जो भक्तिमार्ग में यात्रा करने में बाधक हैं ! इसलिए इस भार से मुक्त होने के लिए निम्न नियमों का पालन करना अनिवार्य है . 


१. किसी के पैर नहीं छूने हैं और ना ही दूसरे को छूने देना है यदि अचानक या मना करने पर भी पैर छू लेता है तो उस स्थिति में नाम खण्ड नहीं होता । आप ने किसी को बद्दुआ या आशीर्वाद नहीं देना है, न ही इच्छा करक किसी से आशीर्वाद लेना है कोई आप के सिर पर आशीर्वाद के लिए हाथ रखे तो आपने मना करना है, फिर भी कोई हाथ रख देता है तो आप का उपदेश सुरक्षित है परन्तु आप ने आशीर्वाद व बदृदुआ बिल्कुल नहीं देनी है । क्योंकि आशीर्वाद देने से आप की भक्ति कमाई जाती है । जैसे एक पहिए की ट्रयूब से दूसरे पहिए की ट्यूब में हवा डालने से आप की गाडी खडी हो जाएगी । आप को हानि हो जाएगी । एक उपदेशी बहन ने अपने अनुपदेशी भाई को स्वस्थ होने का आशीर्वाद दे दिया भाई तो स्वस्थ हो गया परन्तु बहन इतनी ,अस्वस्थ हुई की एक "महिना अस्पताल में रही । पुन: उपदेश लिया अपनी गलती की क्षमा याचना करने पर वह स्वस्थ हो पाई । इसलिए सर्व से प्रार्थना है कि यह गलति न करें। इसी प्रकार अन्य नियमों के खण्ड करने से ' आपकी राम नाम की गाडी में पंचर हो जाएगा वह भी रूक "जाएगी अर्थात् आप जी को हानि होगी । पूर्व समय में सतिप्रथा (परम्परा) थी । जिस किसी का पति मर'जाता था तो उसकी स्त्री को भी मृत पति के साथ जिंदा जलाया जाता था जो एक महा जालिम कर्म था उस समय के मानव समाज ने उस कुरीती को मजबूरन मानना पडता था । किसी महापुरूष ने संघर्ष करके उस सतिप्रथा को बन्द कराया । समाज के रूढीवादी व्यक्तियों ने बहुत विरोध भी किया, परन्तु प्रयत्न सफल हुआ तो आज सर्व बहनें सुखी हैं । इसी प्रकार ये सर्व परम्पराएँ जानों जो मानव समाज पर भार हैं । इनको समाप्त करने से ही भार मुक्त हो सकेंगे तथा भक्ति मार्ग पर आसानी से चल सकेंगे ।


2. टी. वी., कम्यूटर तथा मोबाइल में फिल्म, सीरियल, मैच, कार्टून देखना तथा मोबाइल में विडियो गेम आदि नहीं खेलना है । 


3. किसी को दान (बीना सिला कपड़ा, सीधा आदि) नहीं देना हैं, न ही किसी धार्मिक स्थल (मन्दिर, मैण्डी) के लिए पैसे देने हैं और न ही उनक किसी भंडारे में जाना है। जैसेधर्मशाला, गली पवकी करने, कुआं तथा तालाब (जोहड़) की खुदाई, खेतों के साझले नाले की खुदाई तथा अन्य इसी प्रकार के सामूहिक सामाजिक कार्यो के लिए पैसे दे सकते हैं ।


4. माथे पर तिलक न लगाना है और न ही लगवाना है, भात में पटड़े पर नहीं चढ़ना है, गले में माला नहीं डलवानी है और न ही डालनी है और नही किसी की झोली में पैसे डालने या लेने हैं । यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो विवाह केवल असुर निकन्दन रमैणी करके साधारण विधि से करना है तथा भात परम्परा को समाप्त करना है 


5. कोई त्यौहार, जागरण, मुण्डन, धार्मिक अनुष्ठान जन्मदिन, छटी आदि नही मनाना है, न ही उसमें जाना व सहयोग करना है । , 


6. किसी को दुआ या बदृदुआ नहीं देनी है ।


7. किसी को Good morning, Good afternoon, Good evening, Good night, आदि शब्द नहीं बोलने हैं यदि कोई बोलता है तो उसे समय अनुसार केवल Morning Morning Evening Evening Afternoon व Night Night दो-दो बार बोल दें


8. Happy Birthday, Happy New year, तथा Good bye, आदि शब्द नहीं बोलने हैं यदि कोई आपसे बोलता है तो उसे धन्यवाद या Thank you बोल दे


9. सिक्खों को छोड़कर संत-बाबा रूप में दाढी न हो।


10. बहनों ने नेल पालिस ओर लिपिस्टिक नही लगानी हैं ।


11. परफ्यूम तथा सेंट आदि नहीं लगाना है ।


12. विवाहित बहनें केवल सिन्दूर या बिन्दी में से एक चीज लगा सकती हैं ।


13. किसी अनउपदेशी का झूठा नहीं खाना है यदि अनजान में खाया है तो क्षमा होता हैं । भविष्य में ध्यान रखें ।


14. हाथों पर मेंहदी नहीं लगानी है । किसी बिमारी के कारण लगा सकते है, सिर में लगा सकते हैं । हाथों में मेहंदी लगाने से नाम खण्ड होता है ।


15. शादी में जाते है तो पैसे (शगुन' वारफेरी, मुंह दिखाई पर पैसे) नहीं देने है । विदाई के समय घर में नारियल नहीं फोड़ना है, कन्याविदाई के समय गाडी पर पानी डालना या धवका लगाना आदि सगुन करना मना है ।


16. किसी को किसी भी अवसर पर Gift देना मना है 1 अगर कोई 6111दे तो कोशिश करनी है ना लो 1 अगर कोई पीछे से रख जाऐ या डाक या कोरियर द्वारा भेजे तो उसको रख लें उनके उपलक्ष में कुछ रूपये दान आश्रम में कर दें ।


17. परिवार में किसी की भी शादी हो तो परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कपड़े आदि नहीं देने व नहीं लेने हैं । 


18. कन्या दान रूप में कपड़े, गहने आदि नहीं देने हैं। रूपये भी इस उपलक्ष में देने हैं कि आप ने वहां खाना खाया है । और बहन के घर जाते है तो इसी उद्देश्य से पैसे दे सकते हैं कि आपने वहां खाना खाया है या चाय आदि पी है यदि अधिक धन दे दिया तो आप की बहन पर आप का ऋण न हो जाए तथा संस्कार न जुड जाऐं । क्योंकि हम संस्कार वश ही यहां काल जाल में रह जाते हैं । यदि आप पैसा देना चाहें और बहन न लेवे तो दोनों ही भार मुक्त हो जाते हैं । यदि बहन-बुआ जी आदि उपदेशी हैं तो उन को चाहिए कि वह पैसा रूपया-कपड़ा आभूषण कदापि न लें । प्यार से कहें कि आपने कह दिया, हमने मान लिया, ऐसे शिष्टाचार से मना कर दें । 


19. स्कूल में गायत्री मन्त्र बोलते समय ओं३म् शब्द नहीं बोलना है । क्योंकि जिसे गायत्री मंत्र कहते है यह यजुर्वेद कं अध्याय 36 का मंत्र 3 है । मूल पाठ में ओ३म् मन्त्र नहीं है । वेद परमात्मा की अनूठी देन है इसमें वृद्धि या कटौती करना, परमात्मा का अपमान है, लाभ के स्थान पर हानि ही होती है, इस लिए इस मन्त्र के साथ ओउम् नहीं बोलना है । यजुर्वेद के अ. 36 मंत्र 3 अर्थात् कथित "गायत्री मंत्र” मात्र परमात्मा की महिमा का एक मंत्र है । इसे पढने से परमात्मा के गुणों का ज्ञान होता है । जैसे बिजली की महिमा कहीं लिखी हो उसको कविता बनाकर गाते रहने से बिजली के गुणों का ज्ञान है परन्तु बिजली का लाभ नहीं मिल सकता लाभ तो बिजली का कनेक्शन लेने से ही मिलेगा इसी प्रकार यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 जिसको गायत्री मंत्र बताकर जाप करने को कहते हैं वह व्यर्थ है । क्योंकि यह मंत्र तो परमात्मा की महिमा का ज्ञान कराता है । परमेश्वर के गुणों अर्थात् लाभ को बताता है । वह लाभ अधिकारी संत से सत्यनाम व सारनाम की दीक्षा प्राप्त करके अर्थात् कनेक्शन लेकर ही प्राप्त हो सकते हैैं यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 अर्थात् गायत्री मंत्र की आवृर्ति करने से नहीं फिर भी कोई अज्ञानी व्यक्ति विद्यार्थियों को विवश ' करे तो 🕉️ शब्द का उच्चारण न करें केवल गायत्री मंत्र का भुर्भव: स्व: से ही उच्चारण प्रारम्भ करें । "ओ३म" एक अक्षर को न लगाएँ अध्यापकों को चाहिए कि यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 की अपेक्षा सन्त गरीबदास जी महाराज की वाणी से मंगलाचरण विद्यार्थीयों से बुलाए' । गायत्री मंत्र से कई गुणा लाभ होता है परन्तु सत्यनाम बिना सब व्यर्थ है ।

 20. किसी मुर्दे के अंतिम संस्कार में लकड़ी डाल सकते हैं ! कंधे पर या'अन्य साधन द्वारा शव को ले जा सकते हैं !

 21. मुर्दे पर एक से अधिक कफन नहीं डालना है यदि आप से पहले किसी ने कफन डाल रखा हैं तो आप ने कफन नहीं डालना हैं क्योंकि कफन केवल एक ही होता है अगर पहले कफन डाल रखा है फिर किसी ने एक से ज्यादा कफन डाला है तो नाम खण्ड होता है ! 


22. शादी में खाना खा सकते है, लड़के या लड़की की शादी में खाना खाकर आते हैं यह मान कर पैसे दे सकते हैं कि आपने वाहां भोजन खाया हैं ।


23. यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो पीलिया देना, छुछक देना बन्द करना है । एक पक्ष अनुपदेशी है तो केवल एक २ जोडी कपड़े केवल जच्चा व बच्चे के देने हैं ।


24. नौकरी पर आॅफिस में जब कोई रिटायर होता है तो आॅफिस में सभी आपस में पैसे इकठ्ठे करके उसे Gift तथा पार्टी देते हैं ऐसा कर सकते हैं । (इसमें थोडा बहुत दे सकते हैं) लेकिन उपदेशी ने कतई नहीं लेना है । 


25. घर में जब बहन आती है तो उसे कपड़े व पैसे नहीं देने हैं । अगर बहन या बेटी अनुपदेशी है तो बहुत कम एक २ जोडी कपडे दे सकते है । बच्चों के लिए खाने पीने का सामान दे सकते हैं और अगर जब बहन के घर जाते हैं तो साथ में बच्चों के लिए फल, मिठाई आदि ले जा सकते हैं । 


26. स्कूल में विदाई पार्टी के समय बच्चे पैसे दे सकते हैं ।

 27. गौशाला में पैसा नहीं, चारा आदि दे सकते हैं । 


28. शादी की मिठाई कोई घर में लेकर आए तो और कुछ शादी के नाम के कार्ड के साथ मिठाई लाते हैं तो हृदय से मना करें । फिर भी कोई रख जाए तो खा सकते हैं उस के बदले में कुछ रूपये आश्रम में दान कर दें । आप पर भार नहीं रहेगा। अगर उपदेशी परिवार शादी में मिटाई बनाए तो वो आई हुई रिश्तेदारी या बहन को मिठाई बांधकर दे सकते है, परन्तु यह मिठाई बनाने की परम्परा ही गलत है सामान्य भोजन बनाऐं जैसे अतिथि का सत्कार करने के लिए बनाते हैं खीर, खाण्ड हल्वा बना सकते हैं । 


29. भगत भाई आपस में उधार सामान एक दूसरे से ले सकते हैं और अगर आपस में एक दूसरे के घर आते जाते हैं तो बच्चों के लिए खाने पीने का सामान ले जा सकते हैं । 


30. भाई या बहन की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो आर्थिक या अन्य मदद उधार रूप में कर सकते हैं । बहन को चाहिए कि उस पैसे को लौटाए जिस से उस पर भार नहीं बनेगा । यदि बहन धन लौटाने में असमर्थ है तो' भाई कभी बहन पर पैसे लौटाने का दबाब न बनाए । 


31. लड़की की शादी में माता पिता अपनी लड़की को एक दो जोड़ी कपड़े दे सकते हैं पैसे नहीं, अगर लड़के की शादी में लड़की वाले बगैर नाम वाले है और वो अगर जबरदस्ती अपनी लड़की को कुछ देना चाहे तो इसी प्रकार लड़की की शादी में लड़के वाले अनउपदेशी कुछ मांग करे तो स्पष्ट मना कर दें बिल्कुल नहीं लेना देना हैं । 


32. जिन लडकियों का विवाह होता है वे जिन कपड़ो को पहन कर विवाह मण्डप अर्थात रमैणी में बैठे उन्हीं कपड़ों में अपनी ससुराल जाऐं । अन्य पोशाक न बदले किन्हीं परिस्थितियों में बदलनी पडें (जैसे मिट्टी लग जाए' गीली हो जाए या अन्य कारण से खराब हो जाए) तो बदल सकतें हैं । अन्यथा नहीं । देखने में आया है कि कुछ बहनें रमैणी में विवाह के समय सामान्य पोषाक पहनती है‘ बाद ने तड़क भड़क वाली पोषाक पहन कर ससुराल जाती है' 

वह मर्यादा के विरूद्ध है । विवाह के समय जैसी भी नई या' पुरानी पोषाक पहन रखी है, उसी को पहन कर ससुराल जाऐ, अन्य या उपरोक्त परिस्थितियों मे' पोषाक बदली जा सकती है । 


33 आपके द्वार पर कोई भिक्षुक आता या कहीं बाजार में आप से कोई भिक्षा माँगता है तो उसे पैसे न दें खाना खिला दें । यदि उसको वस्त्र की आवश्यकता है तो वस्त्र बिना सिला न दें, पुराना या नया सिला हुआ कपड़ा दें ' कम्बल या चादर भी पुराना दें नहीं तो अधिकतर भिक्षुक शराबी कवाबी हैं, नए कपडों को बेचकर शराब आदि नशीली वस्तुओं का प्रयोग करते हैं वह दोष दान करने वाले को भी लगेगा । एक श्रद्धालु ने कहा कि यह अच्छा सा नहीं लगता कि भिक्षुक को रूपये न दें, आत्मा नहीं मानती? उस के लिए उत्तर तथा एक उदाहरण यह है कि एक भद्रपुरूष ने एक भिखारी को 1०० रूपयों की भिक्षा दे दी । पहले वह भिक्षुक पाव शराब पीता था अपनी पत्नी व परिवार को परेशान करता था । उस दिन 100 रूपये प्राप्त होने के कारण उस भिखारी ने आधा बोतल शराब पी ली । शराब के नशे में अपनी पत्नी को पीट डाला । उस भिखारी की पत्नी ने बच्चों समेत आत्महत्या कर लीं । उस जैनटलमैन के सौ रूपये के दान ने एक परिवार को उजाड दिया । इसका दोष दानकर्ता को है । गीता में लिखा है कि कुपात्र को किया दान लाभ के स्थान पर हानि करता है । कबीर परमेश्वर जी कहतें हैं : 


गुरु बिन माला फेरते गुरु बिन देते दान । गुरु बिन दोनों निस्फल हैं, पूछो वेद पुरान । । 


34. किसी भी नियम के खण्डित हो जाने पर आप को परमेश्वर से मिलने वाला लाभ बन्द हो जाएगा। जैसे बिजली का कनैक्शन कट जाने पर सर्व लाभ बन्द हो जाते हैं । जो कार्य बिजली से होने थे वे रूक जाते हैं । इसी प्रकार परमात्मा की शक्ति से जो आपको तथा आपके परिवार को लाभ मिलना था वह रूक जाता है । एक बहन ने बताया कि उसके पति ने दीक्षा भी ले रखी है किसी भी नियम का पालन नहीं करता । इसी प्रकार एक भक्त ने अपनी पत्नी की शिकायत की । उसके विषय में यह जाने कि उनका नाम खण्डित हो चुका है ऐसे व्यक्तियों का कोई भयंकर पाप कर्म है । नाम खपिडत होने पर वह पापकर्म अपना प्रभाव करके हानि करेगा जब तक मर्यादा में रहकर भक्ति करते हैं तो वह पाप कर्म हानि नहीं कर सकता । 


एक बहन ने ऐसे ही नाम खपिडत कर रखा था कुछ वर्षों के पस्चात् उसकी जीभ में केंसर का रोग हो गया उस बहन से पूछा कि क्या अब आपको टीवी. देखना, लिपिस्टीक लगाना अच्छा लगता है? उसने रोते हुए कहा नहीं-नहीं । 


इसी प्रकार परिवार व शरीर में हानी से बचने के लिए तथा परमात्मा से लाभ प्राप्त करके मोक्ष प्राप्ति के लिए मर्यादा में रहे अन्यथा पाप कर्म आपको क्षति कर देगा । 


इसलिए सर्व मुपयात्माओं से पुनः निवेदन है कि सर्व नियमों का विधीवत् पालन करके मानव जीवन को सफल बनाये तथा पूर्ण मोक्ष प्राप्त करके सदा सुखी बने, सतलोक में निवास करें । 


जो विद्यार्थी शिक्षा समय में मौज मरती करते हैं वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं आजीवन कष्ट उठाते हैं । जो शिक्षा के समय मे मौज मस्ती न करके लगन से शिक्षा पूरी कर जाते है तो उनको विद्यालय में किये प्रयत्न का फल बाहर क्षेत्र में नौकरी द्वारा प्राप्त होता है । इसी प्रकार सर्व मानव परमात्मा प्राप्ति के विद्यालय में विद्यार्थी (भक्त) हैं । जो भक्त मौज मस्ती करते हैं । भक्ति तथा नियमों का पालन न करके अन्य प्राणियों के शरीरों में घोर कष्ट उठायेंगे । जो लगन के साथ मर्यादा में रहकर परमेश्वर कबीर जी की भक्ति साधना जगत गुरु संत रामपाल जी महाराज से प्राप्त करके आजीवन करते रहेंगे उनको सत्यलोक में सर्व सुविधाएँ प्राप्त होगी वहाँ वृद्ध अवस्था नहीं है मृत्यु भी नहीं होती ऐसा ही जीवन है, नर-नारी व परिवार है वह कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता । इसलिए सत्य भक्ति करके अपना जीवन सफल बनायें । जिस सत्य भक्ती से आपको यहां भी सर्व आवश्यक सुउपदेश प्राप्त पुश्यात्माएँ परमात्मा कें मार्ग पा चलतीं हैं । वह परमात्मा प्राप्ति के लिए यात्रा प्रारंभ करती है । यात्री बहुत ही कम सामान लेकर यात्रा करता है । अधिक भार उठा कर यात्रा करना संभव नहीं होता । जो सांसारिक परम्पराऐ हैं, वे व्यर्थ का भार है जो भक्तिमार्ग में यात्रा करने में बाधक हैं ! इसलिए इस भार से मुक्त होने के लिए निम्न नियमों का पालन करना अनिवार्य है . 


१. किसी के पैर नहीं छूने हैं और ना ही दूसरे को छूने देना है यदि अचानक या मना करने पर भी पैर छू लेता है तो उस स्थिति में नाम खण्ड नहीं होता । आप ने किसी को बद्दुआ या आशीर्वाद नहीं देना है, न ही इच्छा करक किसी से आशीर्वाद लेना है कोई आप के सिर पर आशीर्वाद के लिए हाथ रखे तो आपने मना करना है, फिर भी कोई हाथ रख देता है तो आप का उपदेश सुरक्षित है परन्तु आप ने आशीर्वाद व बदृदुआ बिल्कुल नहीं देनी है । क्योंकि आशीर्वाद देने से आप की भक्ति कमाई जाती है । जैसे एक पहिए की ट्रयूब से दूसरे पहिए की ट्यूब में हवा डालने से आप की गाडी खडी हो जाएगी । आप को हानि हो जाएगी । एक उपदेशी बहन ने अपने अनुपदेशी भाई को स्वस्थ होने का आशीर्वाद दे दिया भाई तो स्वस्थ हो गया परन्तु बहन इतनी ,अस्वस्थ हुई की एक "महिना अस्पताल में रही । पुन: उपदेश लिया अपनी गलती की क्षमा याचना करने पर वह स्वस्थ हो पाई । इसलिए सर्व से प्रार्थना है कि यह गलति न करें। इसी प्रकार अन्य नियमों के खण्ड करने से ' आपकी राम नाम की गाडी में पंचर हो जाएगा वह भी रूक "जाएगी अर्थात् आप जी को हानि होगी । पूर्व समय में सतिप्रथा (परम्परा) थी । जिस किसी का पति मर'जाता था तो उसकी स्त्री को भी मृत पति के साथ जिंदा जलाया जाता था जो एक महा जालिम कर्म था उस समय के मानव समाज ने उस कुरीती को मजबूरन मानना पडता था । किसी महापुरूष ने संघर्ष करके उस सतिप्रथा को बन्द कराया । समाज के रूढीवादी व्यक्तियों ने बहुत विरोध भी किया, परन्तु प्रयत्न सफल हुआ तो आज सर्व बहनें सुखी हैं । इसी प्रकार ये सर्व परम्पराएँ जानों जो मानव समाज पर भार हैं । इनको समाप्त करने से ही भार मुक्त हो सकेंगे तथा भक्ति मार्ग पर आसानी से चल सकेंगे ।


2. टी. वी., कम्यूटर तथा मोबाइल में फिल्म, सीरियल, मैच, कार्टून देखना तथा मोबाइल में विडियो गेम आदि नहीं खेलना है । 


3. किसी को दान (बीना सिला कपड़ा, सीधा आदि) नहीं देना हैं, न ही किसी धार्मिक स्थल (मन्दिर, मैण्डी) के लिए पैसे देने हैं और न ही उनक किसी भंडारे में जाना है। जैसेधर्मशाला, गली पवकी करने, कुआं तथा तालाब (जोहड़) की खुदाई, खेतों के साझले नाले की खुदाई तथा अन्य इसी प्रकार के सामूहिक सामाजिक कार्यो के लिए पैसे दे सकते हैं ।


4. माथे पर तिलक न लगाना है और न ही लगवाना है, भात में पटड़े पर नहीं चढ़ना है, गले में माला नहीं डलवानी है और न ही डालनी है और नही किसी की झोली में पैसे डालने या लेने हैं । यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो विवाह केवल असुर निकन्दन रमैणी करके साधारण विधि से करना है तथा भात परम्परा को समाप्त करना है 


5. कोई त्यौहार, जागरण, मुण्डन, धार्मिक अनुष्ठान जन्मदिन, छटी आदि नही मनाना है, न ही उसमें जाना व सहयोग करना है । , 


6. किसी को दुआ या बदृदुआ नहीं देनी है ।


7. किसी को Good morning, Good afternoon, Good evening, Good night, आदि शब्द नहीं बोलने हैं यदि कोई बोलता है तो उसे समय अनुसार केवल Morning Morning Evening Evening Afternoon व Night Night दो-दो बार बोल दें


8. Happy Birthday, Happy New year, तथा Good bye, आदि शब्द नहीं बोलने हैं यदि कोई आपसे बोलता है तो उसे धन्यवाद या Thank you बोल दे


9. सिक्खों को छोड़कर संत-बाबा रूप में दाढी न हो।


10. बहनों ने नेल पालिस ओर लिपिस्टिक नही लगानी हैं ।


11. परफ्यूम तथा सेंट आदि नहीं लगाना है ।


12. विवाहित बहनें केवल सिन्दूर या बिन्दी में से एक चीज लगा सकती हैं ।


13. किसी अनउपदेशी का झूठा नहीं खाना है यदि अनजान में खाया है तो क्षमा होता हैं । भविष्य में ध्यान रखें ।


14. हाथों पर मेंहदी नहीं लगानी है । किसी बिमारी के कारण लगा सकते है, सिर में लगा सकते हैं । हाथों में मेहंदी लगाने से नाम खण्ड होता है ।


15. शादी में जाते है तो पैसे (शगुन' वारफेरी, मुंह दिखाई पर पैसे) नहीं देने है । विदाई के समय घर में नारियल नहीं फोड़ना है, कन्याविदाई के समय गाडी पर पानी डालना या धवका लगाना आदि सगुन करना मना है ।


16. किसी को किसी भी अवसर पर Gift देना मना है 1 अगर कोई 6111दे तो कोशिश करनी है ना लो 1 अगर कोई पीछे से रख जाऐ या डाक या कोरियर द्वारा भेजे तो उसको रख लें उनके उपलक्ष में कुछ रूपये दान आश्रम में कर दें ।


17. परिवार में किसी की भी शादी हो तो परिवार के अन्य सदस्यों के लिए कपड़े आदि नहीं देने व नहीं लेने हैं । 


18. कन्या दान रूप में कपड़े, गहने आदि नहीं देने हैं। रूपये भी इस उपलक्ष में देने हैं कि आप ने वहां खाना खाया है । और बहन के घर जाते है तो इसी उद्देश्य से पैसे दे सकते हैं कि आपने वहां खाना खाया है या चाय आदि पी है यदि अधिक धन दे दिया तो आप की बहन पर आप का ऋण न हो जाए तथा संस्कार न जुड जाऐं । क्योंकि हम संस्कार वश ही यहां काल जाल में रह जाते हैं । यदि आप पैसा देना चाहें और बहन न लेवे तो दोनों ही भार मुक्त हो जाते हैं । यदि बहन-बुआ जी आदि उपदेशी हैं तो उन को चाहिए कि वह पैसा रूपया-कपड़ा आभूषण कदापि न लें । प्यार से कहें कि आपने कह दिया, हमने मान लिया, ऐसे शिष्टाचार से मना कर दें । 


19. स्कूल में गायत्री मन्त्र बोलते समय ओं३म् शब्द नहीं बोलना है । क्योंकि जिसे गायत्री मंत्र कहते है यह यजुर्वेद कं अध्याय 36 का मंत्र 3 है । मूल पाठ में ओ३म् मन्त्र नहीं है । वेद परमात्मा की अनूठी देन है इसमें वृद्धि या कटौती करना, परमात्मा का अपमान है, लाभ के स्थान पर हानि ही होती है, इस लिए इस मन्त्र के साथ ओउम् नहीं बोलना है । यजुर्वेद के अ. 36 मंत्र 3 अर्थात् कथित "गायत्री मंत्र” मात्र परमात्मा की महिमा का एक मंत्र है । इसे पढने से परमात्मा के गुणों का ज्ञान होता है । जैसे बिजली की महिमा कहीं लिखी हो उसको कविता बनाकर गाते रहने से बिजली के गुणों का ज्ञान है परन्तु बिजली का लाभ नहीं मिल सकता लाभ तो बिजली का कनेक्शन लेने से ही मिलेगा इसी प्रकार यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 जिसको गायत्री मंत्र बताकर जाप करने को कहते हैं वह व्यर्थ है । क्योंकि यह मंत्र तो परमात्मा की महिमा का ज्ञान कराता है । परमेश्वर के गुणों अर्थात् लाभ को बताता है । वह लाभ अधिकारी संत से सत्यनाम व सारनाम की दीक्षा प्राप्त करके अर्थात् कनेक्शन लेकर ही प्राप्त हो सकते हैैं यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 अर्थात् गायत्री मंत्र की आवृर्ति करने से नहीं फिर भी कोई अज्ञानी व्यक्ति विद्यार्थियों को विवश ' करे तो 🕉️ शब्द का उच्चारण न करें केवल गायत्री मंत्र का भुर्भव: स्व: से ही उच्चारण प्रारम्भ करें । "ओ३म" एक अक्षर को न लगाएँ अध्यापकों को चाहिए कि यजुर्वेद अध्याय 36 मंत्र 3 की अपेक्षा सन्त गरीबदास जी महाराज की वाणी से मंगलाचरण विद्यार्थीयों से बुलाए' । गायत्री मंत्र से कई गुणा लाभ होता है परन्तु सत्यनाम बिना सब व्यर्थ है ।

 20. किसी मुर्दे के अंतिम संस्कार में लकड़ी डाल सकते हैं ! कंधे पर या'अन्य साधन द्वारा शव को ले जा सकते हैं !

 21. मुर्दे पर एक से अधिक कफन नहीं डालना है यदि आप से पहले किसी ने कफन डाल रखा हैं तो आप ने कफन नहीं डालना हैं क्योंकि कफन केवल एक ही होता है अगर पहले कफन डाल रखा है फिर किसी ने एक से ज्यादा कफन डाला है तो नाम खण्ड होता है ! 


22. शादी में खाना खा सकते है, लड़के या लड़की की शादी में खाना खाकर आते हैं यह मान कर पैसे दे सकते हैं कि आपने वाहां भोजन खाया हैं ।


23. यदि दोनों पक्ष उपदेशी हैं तो पीलिया देना, छुछक देना बन्द करना है । एक पक्ष अनुपदेशी है तो केवल एक २ जोडी कपड़े केवल जच्चा व बच्चे के देने हैं ।


24. नौकरी पर आॅफिस में जब कोई रिटायर होता है तो आॅफिस में सभी आपस में पैसे इकठ्ठे करके उसे Gift तथा पार्टी देते हैं ऐसा कर सकते हैं । (इसमें थोडा बहुत दे सकते हैं) लेकिन उपदेशी ने कतई नहीं लेना है । 


25. घर में जब बहन आती है तो उसे कपड़े व पैसे नहीं देने हैं । अगर बहन या बेटी अनुपदेशी है तो बहुत कम एक २ जोडी कपडे दे सकते है । बच्चों के लिए खाने पीने का सामान दे सकते हैं और अगर जब बहन के घर जाते हैं तो साथ में बच्चों के लिए फल, मिठाई आदि ले जा सकते हैं । 


26. स्कूल में विदाई पार्टी के समय बच्चे पैसे दे सकते हैं ।

 27. गौशाला में पैसा नहीं, चारा आदि दे सकते हैं । 


28. शादी की मिठाई कोई घर में लेकर आए तो और कुछ शादी के नाम के कार्ड के साथ मिठाई लाते हैं तो हृदय से मना करें । फिर भी कोई रख जाए तो खा सकते हैं उस के बदले में कुछ रूपये आश्रम में दान कर दें । आप पर भार नहीं रहेगा। अगर उपदेशी परिवार शादी में मिटाई बनाए तो वो आई हुई रिश्तेदारी या बहन को मिठाई बांधकर दे सकते है, परन्तु यह मिठाई बनाने की परम्परा ही गलत है सामान्य भोजन बनाऐं जैसे अतिथि का सत्कार करने के लिए बनाते हैं खीर, खाण्ड हल्वा बना सकते हैं । 


29. भगत भाई आपस में उधार सामान एक दूसरे से ले सकते हैं और अगर आपस में एक दूसरे के घर आते जाते हैं तो बच्चों के लिए खाने पीने का सामान ले जा सकते हैं । 


30. भाई या बहन की आर्थिक स्थिति कमजोर हो तो आर्थिक या अन्य मदद उधार रूप में कर सकते हैं । बहन को चाहिए कि उस पैसे को लौटाए जिस से उस पर भार नहीं बनेगा । यदि बहन धन लौटाने में असमर्थ है तो' भाई कभी बहन पर पैसे लौटाने का दबाब न बनाए । 


31. लड़की की शादी में माता पिता अपनी लड़की को एक दो जोड़ी कपड़े दे सकते हैं पैसे नहीं, अगर लड़के की शादी में लड़की वाले बगैर नाम वाले है और वो अगर जबरदस्ती अपनी लड़की को कुछ देना चाहे तो इसी प्रकार लड़की की शादी में लड़के वाले अनउपदेशी कुछ मांग करे तो स्पष्ट मना कर दें बिल्कुल नहीं लेना देना हैं । 


32. जिन लडकियों का विवाह होता है वे जिन कपड़ो को पहन कर विवाह मण्डप अर्थात रमैणी में बैठे उन्हीं कपड़ों में अपनी ससुराल जाऐं । अन्य पोशाक न बदले किन्हीं परिस्थितियों में बदलनी पडें (जैसे मिट्टी लग जाए' गीली हो जाए या अन्य कारण से खराब हो जाए) तो बदल सकतें हैं । अन्यथा नहीं । देखने में आया है कि कुछ बहनें रमैणी में विवाह के समय सामान्य पोषाक पहनती है‘ बाद ने तड़क भड़क वाली पोषाक पहन कर ससुराल जाती है' 

वह मर्यादा के विरूद्ध है । विवाह के समय जैसी भी नई या' पुरानी पोषाक पहन रखी है, उसी को पहन कर ससुराल जाऐ, अन्य या उपरोक्त परिस्थितियों मे' पोषाक बदली जा सकती है । 


33 आपके द्वार पर कोई भिक्षुक आता या कहीं बाजार में आप से कोई भिक्षा माँगता है तो उसे पैसे न दें खाना खिला दें । यदि उसको वस्त्र की आवश्यकता है तो वस्त्र बिना सिला न दें, पुराना या नया सिला हुआ कपड़ा दें ' कम्बल या चादर भी पुराना दें नहीं तो अधिकतर भिक्षुक शराबी कवाबी हैं, नए कपडों को बेचकर शराब आदि नशीली वस्तुओं का प्रयोग करते हैं वह दोष दान करने वाले को भी लगेगा । एक श्रद्धालु ने कहा कि यह अच्छा सा नहीं लगता कि भिक्षुक को रूपये न दें, आत्मा नहीं मानती? उस के लिए उत्तर तथा एक उदाहरण यह है कि एक भद्रपुरूष ने एक भिखारी को 1०० रूपयों की भिक्षा दे दी । पहले वह भिक्षुक पाव शराब पीता था अपनी पत्नी व परिवार को परेशान करता था । उस दिन 100 रूपये प्राप्त होने के कारण उस भिखारी ने आधा बोतल शराब पी ली । शराब के नशे में अपनी पत्नी को पीट डाला । उस भिखारी की पत्नी ने बच्चों समेत आत्महत्या कर लीं । उस जैनटलमैन के सौ रूपये के दान ने एक परिवार को उजाड दिया । इसका दोष दानकर्ता को है । गीता में लिखा है कि कुपात्र को किया दान लाभ के स्थान पर हानि करता है । कबीर परमेश्वर जी कहतें हैं : 


गुरु बिन माला फेरते गुरु बिन देते दान । गुरु बिन दोनों निस्फल हैं, पूछो वेद पुरान । । 


34. किसी भी नियम के खण्डित हो जाने पर आप को परमेश्वर से मिलने वाला लाभ बन्द हो जाएगा। जैसे बिजली का कनैक्शन कट जाने पर सर्व लाभ बन्द हो जाते हैं । जो कार्य बिजली से होने थे वे रूक जाते हैं । इसी प्रकार परमात्मा की शक्ति से जो आपको तथा आपके परिवार को लाभ मिलना था वह रूक जाता है । एक बहन ने बताया कि उसके पति ने दीक्षा भी ले रखी है किसी भी नियम का पालन नहीं करता । इसी प्रकार एक भक्त ने अपनी पत्नी की शिकायत की । उसके विषय में यह जाने कि उनका नाम खण्डित हो चुका है ऐसे व्यक्तियों का कोई भयंकर पाप कर्म है । नाम खपिडत होने पर वह पापकर्म अपना प्रभाव करके हानि करेगा जब तक मर्यादा में रहकर भक्ति करते हैं तो वह पाप कर्म हानि नहीं कर सकता । 


एक बहन ने ऐसे ही नाम खपिडत कर रखा था कुछ वर्षों के पस्चात् उसकी जीभ में केंसर का रोग हो गया उस बहन से पूछा कि क्या अब आपको टीवी. देखना, लिपिस्टीक लगाना अच्छा लगता है? उसने रोते हुए कहा नहीं-नहीं । 


इसी प्रकार परिवार व शरीर में हानी से बचने के लिए तथा परमात्मा से लाभ प्राप्त करके मोक्ष प्राप्ति के लिए मर्यादा में रहे अन्यथा पाप कर्म आपको क्षति कर देगा । 


इसलिए सर्व मुपयात्माओं से पुनः निवेदन है कि सर्व नियमों का विधीवत् पालन करके मानव जीवन को सफल बनाये तथा पूर्ण मोक्ष प्राप्त करके सदा सुखी बने, सतलोक में निवास करें । 


जो विद्यार्थी शिक्षा समय में मौज मरती करते हैं वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं आजीवन कष्ट उठाते हैं । जो शिक्षा के समय मे मौज मस्ती न करके लगन से शिक्षा पूरी कर जाते है तो उनको विद्यालय में किये प्रयत्न का फल बाहर क्षेत्र में नौकरी द्वारा प्राप्त होता है । इसी प्रकार सर्व मानव परमात्मा प्राप्ति के विद्यालय में विद्यार्थी (भक्त) हैं । जो भक्त मौज मस्ती करते हैं । भक्ति तथा नियमों का पालन न करके अन्य प्राणियों के शरीरों में घोर कष्ट उठायेंगे । जो लगन के साथ मर्यादा में रहकर परमेश्वर कबीर जी की भक्ति साधना जगत गुरु संत रामपाल जी महाराज से प्राप्त करके आजीवन करते रहेंगे उनको सत्यलोक में सर्व सुविधाएँ प्राप्त होगी वहाँ वृद्ध अवस्था नहीं है मृत्यु भी नहीं होती ऐसा ही जीवन है, नर-नारी व परिवार है वह कभी मृत्यु को प्राप्त नहीं होता । इसलिए सत्य भक्ति करके अपना जीवन सफल बनायें । जिस सत्य भक्ती से आपको यहां भी सर्व आवश्यक सुख सुविधायें प्राप्त होंगी तथा पूर्ण मोक्ष भी मिलेगा ।

🙏🙏🙏





Dharm

 नन बनते समय लडकियाँ क्या शपथ लेती हैं ?🤔     जनवरी में मैं गोवा गया था... तो शौंक़िया तौर पर मैं वहाँ कि एक प्रसिद्ध चर्च भी चला गया था..!...